मुहब्बत का खुमार

तेरे आने से दिल को करार आया है।
तुझे पाकर खुशियां बेशुमार पाया है।

मैंने पी नहीं लेकिन, मैं नशे में चूर हूं,
मुहब्बत का ये कैसा, खुमार छाया है।

मौसमें भी अब रंगीन सी लगने लगी,
पतझड़ ने भी कैसा, बहार लाया है।

एक दूजे में हम, डूबे कुछ इस कदर,
तू जिस्म है, तो मेरा आकार साया है।

मेरी जिंदगी तो है, एक खुली किताब,
फिर क्यों लगता, असरार छिपाया है।

तेरे सिवा कोई और नज़र आता नहीं,
निगाहों में बस तेरा, निगार बसाया है।

देवेश साखरे ‘देव’

1. असरार-भेद, 2. निगार-छवि

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6 Comments

  1. Poonam singh - April 18, 2019, 1:28 pm

    Bahut khub

  2. ashmita - April 20, 2019, 9:50 pm

    Nice

  3. Antariksha Saha - April 20, 2019, 10:24 pm

    Awesome

  4. Chandani yadav - April 21, 2019, 9:30 pm

    Wahhh

  5. राही अंजाना - April 24, 2019, 11:17 pm

    सही

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