शिकार

शिकार करने चली थी बाज का,
हुस्न के गुरूर मे ।।

हँसी थामे ‘सच’ कहू …
पर भी ना मिला कबुतर का ।।
~ सचिन सनसनवाल

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अब जितने भी अल्फाज है , मेरी कलम ही मेरे साथ है |

1 Comment

  1. Antariksha Saha - May 1, 2019, 12:45 pm

    Awesome

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