ममता

ये पेशानी पे जो लकीरें सी खिंची हुईं है,
आँखों के तले बेनूर रातें सी बिछीं हुईं हैं,
ये जो कांपते हाथों में काँच की चूड़ियाँ हैं,
ऐश-ओ-आराम से जो ताउम्र की दूरियाँ हैं,

ये जो मुस्कुराते होंठ हैं, दर्द को दबाए हुए,
सीने में तमन्नाओं की तुर्बतें छुपाए हुए,
ये जो साड़ियों के कोने कोने हैं फटे हुए,
सालों साल से बस तीन रंगों में बँटे हुए,

ये जो हाथों में गर्म दूध का इक गिलास है,
बूढ़ी आँखों की लौ में भी जो इक आस है,
ये जो सर पर मेरे कोमल सा एक हाथ है,
एक साया, एक दुआ जो हमेशा साथ है,

ये सारी दौलत है मेरी ज़िंदगी की, मेरी कमाई है,
इक ज़िंदगी बनाने को, इक ज़िंदगी ने लुटायी है,
मेरा अस्तित्व, मेरी पहचान, जो भी मेरी क्षमता है,
आधार उसका त्याग है, एक देवी की ममता है।

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5 Comments

  1. देवेश साखरे 'देव' - January 24, 2019, 7:17 pm

    सुंदर रचना

  2. Nandkishor - January 25, 2019, 7:04 pm

    लाजवाब

  3. राही अंजाना - January 27, 2019, 10:02 am

    बढ़िया

  4. Mithilesh Rai - January 28, 2019, 8:34 am

    बहुत खूब

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