माँ की ममता

ममता के मन्दिर की जो मूरत है,दिखने मे बड़ी भोली सूरत है उस माँ को प्रणाम, माँ के चरणों मे प्रणाम। सूना-सूना लगता हे उसके बिना घर-आँगन, खुद से भी ज्यादा करती हे अपनों का लालन-पालन । जब भी माथे पे हाथ फिरौते-फिरौते अपनी गोदी में सुलाती, मीठी-मीठी नींद मे सुलाने नींदया रानी आ जाती। जब भी बेखबर भूख लगती अपने हाथ का बना खाना अपने लाड़ले को अपने हाथों से खिलाती, स्वाद उसमे ममतामयी आता सरजीवन बूँटी लगती उसके हाथ की रोटी। जब भी घर से दूर निकलता वो दरवाजे पर रहती खड़ी-खड़ी ,जब पीछे मुड़कर देखता उसकी निगाहे लगती प्रेम रस से भरी-भरी। जब भी घर लौटता उसके होंटो पे मुस्कुराहटे सज जाती , उसकी वो प्यारी-प्यारी अदाऍ मन को बड़ी भाती। नहीं आताउसको किताबों के काले अक्षरों का उजला ज्ञान, पर पढ लेता मेरी अनकहीं बातो का किताबी चेहरा, उसकी ममता का विज्ञान

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3 Comments

  1. देवेश साखरे 'देव' - January 25, 2019, 3:26 pm

    सुंदर

  2. Mithilesh Rai - January 28, 2019, 8:34 am

    बेहतरीन

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