माँ पर कुछ पंक्तियाँ

पिता

किसी अनजान से बोझ से झुका झुका ये फल दरख्त़ की झड़ों में ढूंढ़ता सुकून के चन्द पल। कभी मिले पत्तों के नर्म साए तो कभी इनमे छनकर आती कुछ सख्त़ किरणें भी। बहुत रोया ये हर उस लम्हे जब इस दरख्त़ को आम का पेड़ कहा किसने भी। मुझे मिठास तब मिली जब इस दरख्त ने आसमां से ज़मीं तक हर चीज़ को चखा। गिरते पत्तों के बदलते रंग देखे तो इस उंगली को उम्र भर थामे रखा। मुझे न छुओ चाहे बनादो इन पत्तों के पत्तल किसी अनजान से... »

माँ

माँ

देखा किसी ने नहीं है मगर बहुत बड़ा बताते हैं लोग, कुछ लोग उसे ईश्वर तो कुछ उसे खुदा बताते हैं लोग, पता किसी के पास नहीं है मगर रस्ता सभी बताते हैं लोग, कुछ लोग उसे मन्दिर तो कुछ उसे मस्ज़िद बताते हैं लोग, ढूढ़ते फिरते हैं जिसे हम यहां वहां भटकते दर बदर, तो कुछ ऐसे भी हैं जो उसे तेरी मेरी माँ बताते हैं लोग।। राही (अंजाना) (Winner of ‘Poetry on Picture’ contest) »

माँ

तुम शान थी मेरी , तुम मान थी मेरी , तुम अभिमान थी मेरी , इस दुःख भरी दुनिया में ,खुशियों की पहचान थी मेरी ! जब इस दुनिया में आयी ,पहचान कराया माँ तमने , परिवार में बेटो के चाह में पागल , पर मैं बेटो से कम नहीं यह स्थान दिलाया तमने ! बचपन से बेटो बेटियों की भेद भाव की सीडी देख बड़ी हुई , पर तुम हर सीडी के बिच खड़ी हुई , मेरी बेटी बेटो से कम नहीं इस बात पे तुम अड़ी रही ! आज भी याद है माँ स्कूल का वो पह... »

माँ

बनाकर खुद से खुद पर ही हैरान हो गया, मेरी माँ की सूरत के आगे वो बेजान हो गया, भेज दिया जिस पल मेरे घर में माँ को उसने, उसका खुद का घर जैसे मानो वीरान हो गया, आसमाँ पर जब तब नज़र चली जाती थी कभी, आज कदमों में ही माँ के मेरा आसमान हो गया।। राही (अंजाना) »

माँ

बनाकर खुद से खुद पर ही हैरान हो गया, मेरी माँ की सूरत के आगे वो बेजान हो गया, भेज दिया जिस पल मेरे घर में माँ को उसने, उसका खुद का घर जैसे मानो वीरान हो गया, आसमाँ पर जब तब नज़र चली जाती थी कभी, आज कदमों में ही माँ के मेरा आसमान हो गया।। राही (अंजाना) »

माँ

पथ दिखाके,लक्ष्य दिखती’ है पथ प्रदर्शक माँ -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

दादी माँ

दादी माँ

दादी पोते के बीच का रिश्ता बहुत अजीब देखा है, किस्से कहानियों का भी रूप मैने सजीव देखा है, सफेद बाल मुलायम खाल का स्पर्श सच्ची याद है मुझे, बिन दाँतों वाली दादी को मैने भी अपने करीब देखा है।। राही (अंजाना) »

माँ

माँ ममता की मूरत है, प्यार का संसार है माँ तपते हुए जीवन में, शीतल सी फुहार है माँ -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

माँ मुझे जग में आने दो

माता मुझको आने दो, बाबा मुझको आने दो है कसूर क्या मेरा, जो आने से रोक रहे में भी हूँ रक्त तेरा, क्यों इसको भूल रहे मुझे किलकारियां लेने दो, माता मुझको आने दो भूल हुई क्या मुझसे बाबा, मैं क्या तेरी संतान नहीं बेटा ही तेरी शान है बाबा, मैं तेरा अभिमान नहीं घुट घुट कर,गर्भ मैं सिसक रहे जग मैं जीवन जीने दो बाबा मुझको आने दो शक्ति का अंश हूँ मैं, तेरा ही वंश हूँ मैं क्या मैंने अपराध किया, मुझे गर्भ मैं... »

माँ गंगा

माँ गंगा तुम्हे नमन, चूमू तेरे चरण तेरी लहरों से शीतलता आये, लगे यु माँ का आँचल चारो दिशा धारा बहती करती हैं कल कल कल -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

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