Poems

“बरसात” #2Linerr-81

 

ღღ__बिन मौसम बरसात यूँ, जला रही है मुझको “साहब”;
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जैसे शमाँ जलाती है, अपने परवाने को बुला के पास!!….‪#‎अक्स

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नफ़रत की फसल उगी है

नफ़रत की फसल उगी है

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हमने उनकी गली को दिया छोड़

जबसे उन्होंने हमसे मुँह लिया मोड़

हमने उनकी गली को दिया छोड़

जबसे उन्होंने मिलने से किया मना

हमने सब अरमानो को किया फना

……यूई

आज आपकी अलविदा को

आज आपकी  अलविदा को, हमने दिल से यूँ मान लिया
दुआ करके खुदा को, तुम्हारी कब्र पे आखिरी सलाम किया

….. यूई

कोई भी करे प्यार मना मुझको

कोई भी करे प्यार मना मुझको
इसका ना पड़ता कोई फर्क मुझको
अब ना कोई उम्मीद रखी किसीसे
सारी प्रीत रची ख़ुद के ही दिलसे

….. यूई

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