Poems

‘ उलझे हुए धागे भी

‘ उलझे हुए धागे भी सुलझाने से सुलझ जाते है
उलझे रिश्तें सुलझाने से और उलझ जाते है /
रिश्तों की नाज़ुकी को क़द्र की पनाह दे दो
वरना रिश्तें किसी उलझे धागे में उलझ जाते है /’

राजेश’अरमान’

कुछ इस तरह से इक

कुछ इस तरह से इक शाम गुजारी है
अपने हिस्से के गम से की वफादारी है
कुछ टुकड़ो में बाँट के रख दिया ग़मों को
अपने साथ हमने की इस तरह फौजदारी है

राजेश’अरमान’

पुनर्जन्म क्या मिथ्या है ???

पुनर्जन्म क्या मिथ्या है ???
या यथार्थ समझ से परे ?
हर नई सुबह भी
तो होती है
पुरानी सुबह का
पुनर्जन्म
अपने ही अंदर
होता है एक नया जन्म
आकार वहीँ
स्वरुप वहीँ
पर अंदर कुछ बदल जाता है?
एक नए जन्म की तरह
नित लेते है अपने ही
अंदर नए जन्म
पुनर्जन्म क्या मिथ्या है ???

राजेश’अरमान ‘

हर जाती सांस ने कहा

हर जाती सांस ने कहा
देख शजर से कोई पत्ता टूटा
राजेश ‘अरमान’

इल्म कुछ तो

इल्म कुछ तो इधर भी होता है
ख्वाब बंद आँखों में जगा होता है
राजेश ‘अरमान’

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