Poems

तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे

तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे
तेरे लहू के समंदर जरा पुकार मुझे

मैं अपने घर को बुलंदी पे चढ के क्या देखूं
उरूजे फन! मेरी देहलीज पर उतार मुझे

उबलते देखी है सूरज से मैनें तारीकी
न रास आएगी यह सुबह जरनिगार मुझे

कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पॉव चूमूंगा
जमान लाख करे आके संगसार मुझे

वह फ़ाका मस्त हूं जिस राह से गुजरता हूं
सलाम करता है आशोब रोजगार मुझे

इक नज़्म कभी कभी जाग उठती है

पुरानी जिंदगी कभी कभी जाग उठती है
यादें आ जाती है याद बेवजह
खारी लकीरें छोडकर रुखसारों पर
न जाने कहां खो जाते है जज्बात मेरे
लफ़्ज जो कभी जुबां पर आ ना पाये
जो छुपते रहे ज़हन के किसी कोने में
उमड उठते है कभी कभी
कागज के किसी कोने में
इक नज़्म कभी कभी जाग उठती है|

AAJ FIR SE JEENE KI KHUWAASIH HAI

KOI LOUTA DE MERE VO DIN

JAB ME HANSTI THI POORE MAN SE

KHELTI THI, LADTI – JAGADTI THI

KABHI KABHI NARAZ HO JAATI THI

KHUD SE HI

 

BANATI THI HAR ROJ NAYE DOST

KARTI THI BAATE KHIDKI PAR BAITHI CHIDIYA SE

HAWAO SE GUFTA-GOO KARTI THI

LAUTA DE KOI MERE VO DIN

AAJ FIR SE JEENE KI KHUWAASIH HAI !

वो जो मुह फेर कर गुजर जाए

वो जो मुह फेर कर गुजर जाए
हश्र का भी नशा उतर जाए

अब तो ले ले जिन्दगी यारब
क्यों ये तोहमत भी अपने सर जाए

आज उठी इस तरह निगाहें करम
जैसे शबनम से फूल भर जाए

अजनबी रात अजनबी दुनिया
तेरा मजरूह अब किधर जाये

Nakaab

!!!!!! SAGAR KI KALAM SE !!!!!!

Chehre ko nakaab main chupaaye baithe ho

khudh ko khudh se hi chipaaye baithe ho

kab tak bachaate rahoge sachhai se khud ko

ki apne dil main hummi ko samaaye baithe ho

@@ SAGAR @@
5/11/15 :: 1:30 PM …. (630) … ©

Page 942 of 1013«940941942943944»