Poems

छुपा है चाँद बदली में…

छुपा है चाँद बदली में ,अमावस आ गयी है क्या?
नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
मिलन की रात में ये घुप्प अँधेरा क्यों सताता है ?
वो मेरा और उसका छुप छुपाना याद आता है..
अभी तो थी फ़िज़ा महकी , क़यामत आ गयी है क्या?

कभी वो थी कभी मैं था, कभी चंचल चमकती रात,
 न वो कहती ,न मैं कहता मगर आँखे थी करती बात..
जिन आँखों में हया भी थी,कज़ा अब आ गयी है क्या?

वो नदियों के किनारो पर जहाँ जाता था मिलने को,
वो नदियां है क्यों प्यासी सी, बुलाती है बुलाने को,
उन्ही नदियों की रहो में रुकावट आ गयी है क्या?

नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या?
…atr

तेरे शहर में..

आज हम भी है मेहमान तेरे शहर में,
 दिखता नहीं मकान तेरे शहर में.
ग़ुम हो गयी है शाम  की मस्ती  भी अब यहाँ,
ग़ुम  हो गया करार तेरे शहर में..
आते  राहों  में मिल  गया तेरा आशिक,
कहने लगा  न जाओ तेरे शहर में.
जब से तुमने छोड़ा है दस्त ए गुलाब को,
वन हो गया वीरान ,तेरे शहर में.
बन्दों का हाल ऐसा मैं कह न सकता मीर,
पागल हुए जवान   तेरे शहर में.
दिन भर उठी है धूल,पैरों में आ लगी,
मैंने कहा  सलाम है,तेरे शहर में.
हर दिन यहाँ पर तेरी यादो का तमाशा,
बिकता है हर मकान तेरे शहर में.
जो गुल था ,गुलदान था,गुलशन ,ग़ुलाब था,
अब आंधी है ,और तूफ़ान तेरे शहर में..

…atr

वह दौर था .

मोहब्बत  का  वह  दौर  था  ,
दिखता नहीं  कुछ  और  था ..


बस हमारे  प्यार  का  सारे जहां में  शोर  था,
उसने  चुराया  दिल   मेरा ,मन  भी  मेरा  चित  चोर  था ..
आश्ना हम  भी  थे,  आशिकी  उनको  भी  थी ,
अब  जहाँ कुछ  और  है,पहले  यहाँ  कुछ  और  था ..
नाम  होता  था  जुबान  पर  दूसरा  वह  दौर  था, 
एक  ही  आवाज  थी ,हर  शै  में  जो  भर  आई  थी ,
 आज  जो  घुट  सा  रहा  है ,कल  वही  बेजोड़  था ..

   .atr

कर्मयोगी

कर्मयोगी

 

अपने कामुक सुखों को कर दमन ,

अपने गुस्से को दया मेँ कर बदल ,

अपने लालच को दान की राह कर चलन ,

अपने स्वधर्म को अंतर्मन से कर मनन ,

अपने कार्यों को भक्ति भाव से कर भरन ,

ले विजय अब कर्म योग मेँ तूं जन्म I

 

अब उसकी राह पकड़ , निश्काम कर्म की राह तूँ जाएगा ,

हर कर्म कर उसे समर्पण , निष्फल अब तूँ रह पाएगा ,

अपना हर धर्म निभा , फल की चाह छोड़ तूँ पाएगा ,

अब निभा हर कर्म को भी , अकर्मी तूँ रह पाएगा ,

अब सब करके भी, मैं तुझको ना छू पाएगी I

 

कर्मों के बंधन को तोड़ , सब कर्मो को उससे जोड़ ,

ख़ुद मेँ उसका रुप जो पाएगा , फिर ख़ुद का कुछ ना भाएगा ,

उस चेतना को ख़ुद मेँ जगा, बस उसके ही कर्म निभायेगा ,

सब उसका खेल रचाया है , उसकी ही यह माया है ,

वोह निर्धारित कर्तव्यों को, ख़ुद तुझसे ही करवाएगा I                                                                                                

                                                       …… यूई विजय शर्मा

एक मुलाकात की तमन्ना मे

आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे
एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे

आप हमारी हकीकत तो बन न सके
ख्वाबों में ही सही हम मगर मिलते रहे

आप से ही चैन ओ सुकून वाबस्ता दिल का
बिन आपके जिंदगी क्या, बस जीते रहे

सावन, सावन सा नहीं इस तनहाई के मौसम में
हम आपको याद करते रहे और बादल बरसते रहे

जब देखा पीछे मुडकर हमने आपकी आस में
एक सूना रास्ता पाया, जिस पर तनहा हम चलते रहे

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