Poems

Gamzada

 

Ghamzada hain kyun,humzada nahin hain kya

ghumshuda hain kyun,humnawa nahin hain kya

akhir tujhko, kis baat ki,fikar…, mujhe bata

teri har ak,arzu ko karunga main pura

 

Umra ke es padaw main akhir kya hain wajah

Ghamzada tu gamzada akhir kyun hain tu gamzada

 

kis aur kis mor pe aa gaya tu gamzada

 

Ghamzada hain kyun,humzada nahin hain kya

ghumshuda hain kyun,humnawa nahin hain kya

 

काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें…….

काटी है रात तुमने भी ले-ले के करवटें

देखो बता रही हैं, चादर की सलवटें।

उधड़ेगी किसी रोज सिलाई ये देखना

यूं इस तरहं जो लेकर अंगडाईयां उट्ठे।

पहले ही हो रही है, बड़ी जोर की बारिश

अब आप लगे भीगी जुल्फों को झटकनें।

तस्वीर मेरी सीने पे रखकर न सोइये

हर सांस मेरी नींद भी लगती है उचटने।

एकटक न देख लेना कहीं डूबता सूरज

मुमकिन है रात भर फिर वो शाम न ढले।

……….सतीश कसेरा

आंगन तो खुला रहने दो………………….

झगड़ों में घर के, घर को शर्मसार मत करो

आंगन तो खुला रहने दो, दीवार मत करो।

मारे शर्म के आंख उठा भी सकूं न मैं

अहसानों का इतना भी कर्जदार मत करो।

हर ओर चल रही हैं, नफरत की आंधियां

और आप कह रहे हो कि प्यार मत करो।

लफ्जों की जगह खून गिरे आपके मुंह से

अपनी जबां को इतनी भी तलवार मत करो।

हंसती हुई आंखों मेें छलक आये न आंसू

हर शख्स पे इतना भी तो एतबार मत करो।

—————–सतीश कसेरा

पसीना भी हर इक मजदूर का………….

कभी दीवार गिरती है, कभी छप्पर टपकता है

कि आंधी और तूफां को भी मेरा घर खटकता है।

चमकते शहर ऐसे ही नहीं मन को लुभाते हैं

पसीना भी हर इक मजदूर का इसमें चमकता है।

गए परदेस रोटी को तो घर सब हो गए सूने

कहीं बिंदियां चमकती है न अब कंगन खनकता है।

यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के

सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।

ये अपने घर लिये फिरते हैं सब अपने ही कांधों पर

नहीं मालूम बसकर फिर कहां जाकर उजड़ता है।

—————-सतीश कसेरा

तूं मेरा आधार है…………..

है कठिन जीवन बहुत,

चहुं और हाहाकार है

बोझ घर का सर पे है,

हर चीज की दरकार है।

बहन शादी को है तरसे,

भाई तक बेकार है

मात—पिता चुप हैं दोनों,

थक चुके लाचार हैं।

मैं अकेला लड रहा हूं,

तीर ना तलवार है

खट रहा हूं, बंट रहा हूं,

घुट रहा घर—बार है।

हौंसला देता है मुझको,

एक तेरा प्यार है

तूं जमीं, तूं आस्मां,बस,

तूं मेरा आधार है।

——-सतीश कसेरा

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