Poems

कसम ख़ुदा की

Khanjar

चाहतों की दुनिया से अब उकता गये है

चाहतों की दुनिया से अब उकता गये है
सब दिखता है यहां, मगर कुछ मिलता नहीं

Truth

Truth

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Where does truth exist ,inside us or amidst the under wraps?
Is it a state of mind or is it an experience?
Is it in our hearts or within our own sanity?
Is it a consolation or is it a treasure,
Mysterious,deep and dark
Veiling our honesty!

Dwelling within us ,the Albatross tied to our own necks,
It is a stature bold and bantam,
Yet silentious and unheard!
Thickening the vessels of vengeance,anger and pain in our hearts,
Scoffing and scorning at our souls so pure!

Is it the forebearer of Fear?
Or is it the a state of despair and destitution of our own existence?
Is it a commitment to our conscience to yield an ephemeral joy,
Like in a fictionary tale?
A complete Utopian feel!

“तुमसे गले मिले हुए” #2Liner-56

ღღ__यूँ तो अरसा हुआ है साहब, तुमसे गले मिले हुए;
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पर जिस्म मेरा आज भी, इत्र-सा महकता है !!……#अक्स
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घर और खँडहर

घर और खँडहर

घर और खँडहर

 

ईटों और रिश्तों  

मैँ गुंध कर

मकान पथरों का  

हो जाता घर

 

ज्यों बालू , सीमेंट और पानी

जोड़ें ईट से ईट

त्यों भरोसा, जज़्बात और प्यार

जोड़ें रिश्तों में मीत

 

चूल्हे में भखती ईटें

माँ की याद दिलाती है

जो ख़ुद के तन पे आग जला

सबकी भूख मिटाती है

 

नींव में दफन ईटें

दादा-दादी की याद दिलाती है

ख़ुद पे सारा बोझ लदा

घर की मंजिलों को बनाती हैं

 

छत में लगी यह ईटें

बाप की याद दिलाती हैं

ख़ुद पे सारी गर्मी खा

घर को ठंडा रखती हैं

 

दीवारों में चिनी यह ईटें

भाभी की याद दिलाती हैं

जो नींव को छत से जोड़

घर की इज़्ज़त बचाती है

                             

आँगन में बिछी यह ईटें

भाई-बहनो  की याद दिलाती हैं

कदमों के थपेड़ों को सह्ती

गिरने पे चोट नहीँ लगाती है

 

खिड़कियों को सम्भालती यह ईटें

गुरूओं की याद दिलाती हैं

रोशनी की किरणें अन्दर ला

अंधेरों को दूर् भगाती हैं

 

सीड़ीयों में लगी यह ईटें

यारों की याद दिलाती हैं

एक एक कदम साथ निभाते

ऊँचाइयों पे ले जाते हैं

 

खँडहर बने हर घर को देख्

यूई को खयाल यहि आता है

यहाँ रिशते चरमराए होंगे

याँ भरोसे डगमगाए होंगे

 

नींव बोझ सह ना पाई होगी

याँ गर्मी में छत पिघलायी होगी

दीवारें कमजोर बन आयी होंगी

याँ खिड़कियाँ बंद रह गई होंगी

 

कुछ ईटों कुछ रिश्तों

के चरमराते ही

हर बसा बसाया घर

खँडहर हो जाता है

                                   ………. यूई           

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