Poems

बिखरे बिखरे ख्वाब

बिखरे बिखरे ख्वाब
सुलगते सुलगते आंसूं
सीने में तूफ़ान
दिल में बस कशिश
काफिले यादों के लम्बे
कोई शै मुकम्मल नहीं
तनहा तनहा सफर
लम्बी लम्बी रातें
न वफ़ा का इल्म
न जफ़ा का तजुर्बा
बस एक गहरी खाई सी जीस्त
उस पर भी सुकु के ,
पंख होते तो उड़ते फिरते
खुली हवा में भी ,
पिंजरे का बंदपन
सांसें भी लेते है ,
खुद पे अहसान जताकर
लगता है सृष्टि रचते वक़्त ही ,
ग़ज़ल भी रच दी गई थी
राजेश ‘अरमान’ १४/०२/१९९०

वर्तमान ही सत्य

वर्तमान ही सत्य बाकी सब मिथ्या है.
भूत तो बिन बाती तेल का दीया है
मत सोच में डुबो, तुझे किसी से क्या मिला
कर हिसाब तूने किसी को क्या दिया है

राजेश ‘अरमान’

फरियाद बन के

फरियाद बन के निकली मेरी वफ़ा तेरी गली में
कौन सुनता मेरे दिल की सदा तेरी गली में

यूँ तो बस आवाज़ हूँ एक बुतखाने की
कौन बख्सेगा यूँ मेरी खता तेरी गली में

दरो-दीवार से लिपटी हुई एक तस्वीर सही
कौन मुड़ के देखेगा यहाँ तेरी गली में

बात दरियां की करों या समुन्दर की
डूब के देखेगा मुझे कौन भला तेरी गली में

मेरी आहट भी मुझे नागवारा गुजरी ‘अरमान’
मेरे सनाटों को सुनेगा कौन भला तेरी गली में
राजेश ‘अरमान’

ग़मे-ए-मुदाम

ग़मे-ए-मुदाम से इस कदर परेशां न हो ,
सुना है हर गम के पंख भी होते है
राजेश’अरमान’

तेरे साथ गुज़ारे

तेरे साथ गुज़ारे चंद लम्हों की
जागीर की बस मिल्कियत रखता हूँ
ये अलग बात है खुद को
सबसे अमीर अब भी समझता हूँ
राजेश’अरमान’

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