Poems

मुसाफिर अपनी राह

मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है
मृग जाने किस चाह से भटक रहा है

रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं
दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है

किस सत्य की खोज में मन व्याकुल
कोई फ़कीर दरगाह से भटक रहा है

अदृश्य विलक्षण तरंगे घूमती तेरे अंदर
मानव फिर किस चाह से भटक रहा है

मोह तेरा कवच के चक्रव्यूह में फंसा
मन कवच की दाह से भटक रहा है

राजेश’अरमान’

सच ने जब

सच ने जब भी तोडा है दम
झूठ ने ही उसे अग्नि दी है
राजेश’अरमान’

था वो गुलाब

था वो गुलाब के मानिंद
नज़र बस तेरी काटों पे गड़ी
मैंने भी महसूस किया कैक्टस को
नज़रे जो कभी फूलों पे पड़ी
राजेश’अरमान’

जब अपनी ही

जब अपनी ही साँसें एहसान जताने लगे
समझ लो साँसें भी अपनी हो गई है
राजेश’अरमान’

कीमत

धर्म की दूकान सदियों से चल रही है ,
कीमत तो चुकाई पर सामान नहीं मिला
राजेश’अरमान’

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