Poems

ये चली कैसी हवा ….!

ये  चली  कैसी  हवा ….!

सोचा  था  खरीदार  बन,

आया  हूँ  इस  जहाँ  मे  मैं,

ये  चली  कैसी  हवा, कि  बिकता  ही  चला  हूँ  मैं…..….   ! .

जाना  था  मुझको  कहाँ, और,

आ  गया  किस  मोड़  पर,

अपनी  चाहतों  को  दूर  ही कहीं  पे  छोड़  कर,

कि  अपना  कहने  को  ख़ुद  ही  को,

ख़ुद  से  ही  डरता  हूँ  मैं, ये  चली  कैसी  हवा,

कि  बिकता  ही  चला  हूँ  मैं …..…!. .

 

पास  है  सबकुछ  मेरे, पर  फ़िर  भी  जाने  क्या  कमी,

भाग  दौड़  के  भंवर  में, सूझता  भी  कुछ  नहीं,

क्या  मुझे  पाना  है, जिससे  बेचता  हूँ  ख़ुद  को  मैं…

ये  चली  कैसी  हवा, कि  बिकता  ही  चला  हूँ  मैं ……..….   ! .

 

उलझने  दिल  की  न  सुलझीं, कोशिशें कितनी थी कीं,

दिल  कहीं  है  और,

ख़ुद  को  ढूँढता  हूँ  मैं  कहीं, बाट  तू  मुझको  दिखाए,

बाट  ही  तकता  हूँ  मैं…..

ये  चली  कैसी  हवा, कि  बिकता  ही  चला  हूँ  मैं………! .

सोचा  था  खरीदार  बन, आया  हूँ  इस  जहाँ  मे  मैं ….? .

 

“ विश्व नन्द ”

A poem, I want to write ….!

 A poem, I want to write ….!

 

I have been longing…

To write a poem…

A poem, I am unable to write…..!

 

 I have tried it with all my intellect & might

 But for this art, neither intellect nor might seems right.

 

Poetry, it is said, is a spontaneous overflow,

Of powerful emotions;

Of the dormant wonderful hidden inhibitions,

That lies buried in our hearts……

And come alive at moments, we never know about….

 

Our hearts are like great oceans,

Full of immense treasures and creations,

Of everything in abundance,

Pains, pleasures and sensations….

 

I have it all, in my heart, to the full….

But Oh! My God, why is the creativity in me so dull……

 

A poem I want to write,

I do not know, what about?

But I am intensely longing….And am sure…

Some day it will spring up, after all…

A day in my life, I will cherish above all….

 

Please don’t laugh,

For who knows now….

My poem may be an attempt at ‘You’

To tell you, what I have never been able to tell you ….

 

                                        

 

             ” Vishvnand “

सुंदर से इक फूल ने ….!

 सुंदर से इक फूल ने ….!

कल  जैसा  था  वह  आज  नहीं,

कल  कैसा  होगा  पता  नहीं,

है  आज  अलग  इन  दोनों  से,

हर दिन जैसे नव फूल  खिले.

पर  दिल  अपनी  मनमानी  मे,

जाने  कैसी  शैतानी  मे,

इस  सुंदर  आज  को  छोड़,

यार, कल  मे  ही  है  रहता  उलझे… (या  बीता  हुआ  कलया  आनेवाला  कल)

सुंदर से इक फूल ने उस दिन,

चुपके से मुझे पास बुलाकर,

कुछ मुस्काकर, कहा ये मुझसे

ऐसे क्यों मुरझाये हो तुम,

ऐसे क्यों घबराए हो तुम,

ऐसा भी है तुमको क्या गम,

इतनी लम्बी उम्र तुम्हारी,

फिर भी तुमको खुशी नहीं है ! मुझको देखो……

कल मुरझा कर मर जाना है,

आज का दिन जो मेरी जिंदगी,

खुश रहकर और खुशी बाँट कर, सुन्दरता से ही जीना है…..”

सुंदर से उस फूल ने मुझको सिखलाया है,

अर्थ नया जीवन का अपने….

कितने दिन जीवन मे काटे

इसका तो कुछ अर्थ नहीं है,

खुश रहकर और खुशी बांटकर,

सुन्दरता से, साथ मे लेकर प्यारे सपने,

निर्भयता से, जितने काटे, उस से ही मतलब है ………

सुंदर से उस फूल ने मुझको सिखलाया है..

सुंदर से उस फूल ने मुझको दिखलाया है….

इसीलिए अय मेरे प्यारों,

फूलों जैसा जियें हर इक दिन,

प्यार करें पल पल से प्यारों,

बचे हुए जीवन के हर दिन.

आओ सब मिल साथ चलें यूं,

हम अपने जीवन मे निशिदिन,

सुन्दरता के बने पुजारी,

सुंदर कर दें जीवनहर दिन ….…..

                    

विश्व नन्द”

 

गुरु महिमा

फूंक देते प्राण मनुज में वो गुरुदेव  कहाते है,

जीवात्मा की परमात्मा से वो ही मिलन कराते है.

मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताकर करते है उद्धार गुरु,

निज शिष्यों को ईश्वर से बढ़कर करते है प्यार गुरु.

कभी कभी निज उपदेशो से मानव का कल्याण करें,

कभी धर्म की शिक्षा देकर मनुज जन्म साकार करें.

अहंकार से मुक्त कराकर माया मोह से दूर भगाकर,

परमानन्द की प्राप्ति कराकर, करते है कल्याण गुरु.

गुरुदेव निज चरणो में प्रणाम मेरा स्वीकार करें ,

अंतर्मन में ज्योति ज्ञान की प्रज़्वलित कर उद्धार करें.

सफल हो गया जीवन मेरा ,पाया जो गुरु का आधार ,

गुरु के इस उपकार कर्म का व्यक्त कर रहा मैं आभार..

…atr

written in 2010

मुक्तक  21

मुक्तक 21

बड़ी सिद्दत से चाहा था ख़ुदा के नूर को मैंने ,

मेरी नीयत भी पाकीज़ा थी मगर इकरार ही न हुआ..

…atr

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