Poems

तिरंगा

अपनी हथेली पर शहीदों के नाम की मेंहदी रचाता रहा हूँ मैं,
खुद ही के रंग में शहादत का रंग मिलाता रहा हूँ मैं,

हार कर सिमट जाते हैं जहाँ हौंसले सभी के,
वहीं हर मौसम में सरहद पर लहराता रहा हूँ मैं,

सो जाती है जहाँ रात भी किसी सैनिक को सुलाने में,
अक्सर उस सैनिक को हर पल जगाता रहा हूँ मैं,

दूर रहकर जो अपनों से चन्द स्वप्नों में मिलते हैं,
उन्हें दिन रात माँ के आँचल का एहसास कराता रहा हूँ मैं,

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई किसी एक जाति का नहीं मैं,
इस पूरे भारत का एक मात्र तिरंगा कहलाता रहा हूँ मैं।।

राही (अंजाना)

माँ के लाल

एक माँ की गोद में एक माँ के लाल आ गए,
दोनों ही माँ की आँखों में आसूँ हाल आ गए,

रंग माथे दुरंगा लगा कर ख़ुशी से भेजा जिन्हें,
वो लिपटकर तिरंगे में आज बदली चाल आ गए,

सरहद पे रहे हथेली पर सांसों का दिया जलाये,
सो लगाकर देखभक्ति की अमिट मशाल आ गए।।

राही अंजाना

नव वर्ष

“नव वर्ष की शुभकामनाएं ”
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नव वर्ष की शुभकामनाएं /
बच्चों में उत्साह जगाएं |
प्रांगन मंदिर संस्कृति अपनाएँ /
देवी को सुमधुर गीत सुनाएँ ||

भगवा ध्वज की पताकायें |
तिलक चन्दन टीका लगाएं ?
नव वर्ष धूम से मनाएं |
देवी को सुमधुर गीत सुनाएँ ||

शंख ध्वनि मृदंग बजाएं /
पुरुषोत्तम राम को याद दिलायें |
विक्रमादित्य का विक्रमी मनाएं /
देवी को सुमधुर गीत सुनाएँ ||

डा ० केशव राव जयंती जगाएं |
झूले लाल को भी ना भुलाएँ /
नव वर्ष की शुभकामनाएं |
देवी को सुमधुर गीत सुनाएँ || –
सुखमंगल सिंह

कायरता

“पुलवामा शहीदों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली”

पीठ पे वार करना, तुम्हारी पुरानी कुनीति है।
आमने – सामने की रण, तुमने कब जीती है।

कायरता के प्रमाण से तुम्हारे, अनभिज्ञ नहीं,
पराजय की, सदैव तुम्हारे हृदय में भीति है।

पौरूषता तो तुममें, कभी देखी नहीं हमने,
धृष्टता दर्शाती, नपुंसकता तुम्हारी प्रकृति है।

मानवता की बात बेमानी, जरा ना तुमने जानी,
निर्दोषों को मारना, तुम्हारी मानसिक विकृति है।

किया पीठ पर वार, अब हो जाओ तुम तैयार,
चुन – चुन कर तुम्हारी, अब चढ़ानी आहुति है।

देवेश साखरे ‘देव’

सच की दीवार

सच की दीवारों पर झूठ की तस्वीरें दिखाई गईं,
जब भी सर उठाया तो बस शमशीरें दिखाई गई,

बैठा ही रहा मैं भी शहंशाहों सा चौकड़ी लगाकर,
एक के बाद एक मुझे सबकी तकदीरें दिखाई गईं।।

राही अंजाना

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