Poems

माटी

जिस्म ऐ माटी में इस रूह को डालता कौन है,
बनाकर इन पुतलों को ज़मी पर पालता कौन है,

मिलाकर हवा पानी आसमाँ आग पृथ्वी को,
वक्त वक्त पर ख़ुशी और गम में ढालता कौन हैं,

तमाम नस्ल के रंगों में रहगुजर उस “राही” को,
जानने की चाहत में अब यूँही खंगालता कौन है।।

राही अंजाना

डर

ख्याल आते तो है मगर दब जाते है कहीं दिल में
अक्सर डर जाते है जमाने के कहर से

मुक्तक

तेरे बग़ैर तन्हा रहने लगा हूँ मैं।
तेरी बेवफ़ाई को सहने लगा हूँ मैं।
जब भी ग़म तड़पाता है मेरे ख़्यालों को-
अश्क़ बनकर पलकों से बहने लगा हूँ मैं।

मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

हाइकु

हथेली पर
सपनों की घड़ियाँ
साकार नहीं।

नदी के पार
रेत के बडे़ टीले
हवा नाचती।

अशोक बाबू माहौर

हाइकु

हथेली पर
सपनों की घड़ियाँ
साकार नहीं।

नदी के पार
रेत के बडे़ टीले
हवा नाचती।

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