Poems

बदलते रहते हैं ज़ुबा लोग पल दो पल में कई बार

बदलते रहते हैं ज़ुबा लोग पल दो पल में कई बार

बदलते रहते हैं ज़ुबा लोग पल दो पल में कई बार,
मगर एक चेहरा बदलने में मुकम्मल वक्त लगता है,
छुपाने से छिप जाते हैं राज़ सिरहाने में कई बार,
मगर झूठ से पर्दे उठ जाने में ज़रा सा वक्त लगता है॥

– राही (अंजाना)

कोख़ से मैं कितना बचती रही

कोख़ से मैं कितना बचती रही,
दुनिया में ला कर तुमने ठुकराया,

शर्म मुझे है ऊपरवाले की इस रचना पर
जहाँ जिस्म के भूखों को मैंने कदम-कदम पे पाया।।

-मनीष

मुक्तक

मुझको तेरी चाहते-नजर चाहिए!
दिल में तमन्नाओं की लहर चाहिए!
झिलमिलाते ख्वाब हों जुगनू की तरह,
मुझको यादों का वही शहर चाहिए!

मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

किनारे पर भी रहूँ तो लहर डुबाने को आ जाती है,

किनारे पर भी रहूँ तो लहर डुबाने को आ जाती है,

किनारे पर भी रहूँ तो लहर डुबाने को आ जाती है,

बीच समन्दर में जाने का हौंसला हर बार तोड़ जाती है,

दिखाने को बढ़ता हूँ जब भी तैरने का हुनर,

समन्दर की फिर एक लहर मुझे पीछे हटा जाती है,

अनजान है वो लहर एक बात से फिर भी मगर देखो,
के वो खुद ही किनारे से टकराकर फिर लौट के आना मुझे सिखा जाती है॥

राही (अंजाना)

वो परछाईं सा साथ चलता रहा है

वो परछाईं सा साथ चलता रहा है,
कभी दिखता तो कभी छिपता रहा है,
दिन के उजाले की शायद समझ है उसको,
तभी अंधेरे में ही अक्सर मिलता रहा है,
कभी चाँद सा घटता तो कभी बढ़ता रहा है,
हर हाल में वो मुझसे रुख करता रहा है॥
– राही (अंजाना)

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