Poems

बंद करो

मैं करता हूँ तुमसे मोहब्बत,
अब खुद को सताना बंद करो !
देता हूँ खूने ए दिल तुम्हे,
हाथों में मेहंदी रचाना बंद करो !!
जो हुये हैं गीले सिकवे ,
उनका इल्जाम लगाना बंद करो !
मुझसे बात करने का अब,
अपना अंदाज पुराना बंद करो !!
मुझसे यूँ ही रूठकर अब,
आंसुओं को बहाना बंद करो !
जरा चैन से सोने भी दो,
अब सपनों में आना बंद करो !!
मेरे साथ ही रहकर अब,
मुझको रुलाना अब बंद करो !
जिन बातों से चोट लगे,
उन शब्दों का आना बंद करो !!

.

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के,

दो रोटी के वास्ते,

ईटे -पत्थर  तलाशते,

तन उघरा मन  बिखरा है,

बचपन  अपना   उजड़ा है,

खेल-खिलौने हैं हमसे दूर,

भोला-भाला  बचपन अपना,

मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर

मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे,

लगते बहुत लुभावने ,

पर बच्चे हम फूटपाथ के,

ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते,

मन हमारा मानव का है,

पर पशुओं सा हम उसे पालते,

कूड़ा-करकट के बीच,

कोई मीठी गोली तलाशते,

सर्दी-गर्मी और बरसात,

करते हम पर हैं वर्जपात,

पग -पग काँटे हैं चुभते,

हम फिर भी हैं हँसते,

पेट जब भर जाए कभी,

उसी दिन त्योहार है समझते,

दो रोटी के वास्ते पल-पल जीते -मरते,

बच्चे हम फूटपाथ के ।।

बचपन गरीब

यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से,
पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से,
रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में,
वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे,
बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से,
पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥
राही (अंजाना)

गरीबी का बिस्तर

गरीबी है कोई तो बिस्तर तलाश करो,
रास्तों पर बचपन है कोई घर तलाश करो,
कचरे में गुजर रही है ज़िन्दगी हमारी,
कोई तो दो रोटी का ज़रिया तलाश करो,
यूँ तो बहुत हैं इस ज़मी पर बाशिन्दे,
मगर इस भीड़ में कोई अपनों का चेहरा तलाश करो,
खड़े हैं पुतले भी ढ़के पूरे बदन को दुकानों में,
जो ढ़क दे हमारे नंगे तन को वो कतरन तलाश करो॥
राही (अंजाना)

Page 3 of 84012345»