Poems

pyaar

Hamne to mohabbat Ke nashe me unhe khuda bana diya.

Hosh to tab aaya jab unhone kaha ki khuda kisi ek ka nahi hota.

मुक्तक

मुक्तक

मेरी जिन्दगी गमें-ख्याल बन गयी है!
तन्हा बेखुदी की मिसाल बन गयी है!
मेरे दर्द की कभी होती नहीं सहर,
रात जुदाई में बेहाल बन गयी है!

मुक्तककार-#मिथिलेश_राय

जिसकों कहतें थे हम हमसफ़र अपना।

जिसकों कहतें थे हम हमसफ़र अपना।

वो तो था ही नही कभी रहगुज़र अपना।।

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तुमको मुबारक हो भीड़ इस दुनिया की।

हम काट लेंगे तन्हा ही ये सफर अपना।।

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भूल गए हो यक़ीनन तुम अपने वादे सारे।

पर उदास रहता है वो गवाह शज़र अपना।।

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न कोई मुन्तज़िर है न है कोई आहट तेरी।

फिर भी सजाता है कोई क्यू घर अपना।।

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ऐ बादल बरसों ऐसे भीगों डालो सबकुछ।

की साहिल जलता बहुत है ये शहर अपना।

@@@@RK@@@@

ऐसा क्यों है

ऐसा क्यों है

चारो दिशाओं में छाया इतना कुहा सा क्यों है

यहाँ जर्रे जर्रे में बिखरा इतना धुआँ सा क्यों है

शहर के चप्पे चप्पे पर तैनात है पुलिसिया

फिर भी मचा इतना कोहराम सा क्यों है.

मिलती है हरएक को छप्पर फाड़कर दौलत

फिर भी यहाँ मरता भूख से इंसान सा क्यों है

चारो तरफ बिखरी हैं जलसों की रंगीनियाँ

फिर भी लोगों में इतना अवसाद सा क्यों है.

हर कोई मन्दिर मस्जिद में जा पुण्य कमाता

फिर भी बढ़ता यहाँ इतना पाप सा क्यों हैं

चलते में बना लेते हैं किसी को भी अपना

फिर भी फैला इतना दुराव सा क्यों है.

उसके जहाँ से आये थे सब एक जैसे लोग

फिर भी यहाँ इतना अलगाव सा क्यों है

वे साथ में जीने मरने की कसमें भी तो खाते थे

फिर भी एक को छोड़कर जीने का अरमान सा क्यों है.

सामने तो खूब कहते थे कि हम सब भाई भाई होते है

फिर भी नजर हटते ही इतना संग्राम सा क्यों है

उसकी गिनती तो अच्छों में होती थी यारो

फिर भी होता इतना बदनाम सा क्यों है.

जनाब तो कहते हैं की सब ठीक चल रहा है

फिर भी होता इतना घमासान सा क्यों है

तेरी साफगोई के तो हम भी कायल थे दोस्त

फिर भी तेरी बातों में इतना घुमाव सा क्यों है.

पिछली बार तो हमसे कहते थे कि यहाँ मत आना

फिर भी आँखों में मेरे आने का इन्तजार सा क्यों है

यहाँ पर तो पहले तासों के मेले लगा करते थे

फिर भी यहाँ इतना सूनसान सा क्यों है.

तुम तो कहते थे कि वो दिल में बसते हैं मेरे

फिर भी उनसे जुदा होने का फरमान सा क्यों है

लाख जोड़े थे टूटे हुए माला के प्यारे से मोती

फिर भी जुड़ने में उनके हैरान सा क्यों है.

सबके चेहरों से टपकती थी कितनी सज्जनता

फिर भी छिपा इनमें ये हैवान सा क्यों है

तुमने तो यहाँ घर बसाने का वादा किया था उनसे

फिर भी यहाँ सन्नाटे का शमशान सा क्यों है.

उनकी बेइज्जती करने का बहुत शौक था तुमको

फिर भी उनके लिए इतना सम्मान सा क्यों है

हमें तो बताया था कि मुंह मोड़ लिया तुमने उनसे

फिर भी दिल में उनका इश्क परवान सा क्यों है.

कहते थे मन्दिर में रहते हैं पत्थर के उजले टुकड़े

फिर भी उस पत्थर में लगता भगवान सा क्यों है

तुमने तो वक्तों में कसम खायी थी ईमानों की

फिर भी तुम्हारा दिल यूं बेईमान सा क्यों है.

भीड़ में तो कहते थे कि बहुत सादे हो मन के

फिर भी अंदर से इतना गुमान सा क्यों है

कहते हैं वो तो बसती है हरएक के दिल में मेहरबानो

फिर भी मोहब्बत का नाम इतना गुमनाम सा क्यों है.

तार टूटे हैं उनके दिल की बजती बीणा के चटके कर

फिर भी वो मोहब्बत के लिए इतना हलकान सा क्यों है

तुम तो कहते थे थूक दोगे उनके आते ही मुंह पर

फिर भी तुम्हारे नक्शों में ये दुआ सलाम सा क्यों है.

घूमते थे हाथों में खंजर लिए उनको मारने की खातिर

फिर भी आज उनपर इतना मेहरबान सा क्यों है

तुम उस वक्त तो कहते थे बेफिजूल की उनको

फिर भी दिल उनकी अदाओं का कदरदान सा क्यों है.

हम जानते हैं तुम दिल से चाहते हो सिर्फ हमको

फिर भी तुम्हारी बातों में दूसरों का बखान सा क्यों है.

राघवेन्द्र त्रिपाठी

राघवेन्द्र त्रिपाठी

हर रास्ता हमसे तंग हुआ, हम फिर रास्ते की तलाश मे निकले ,
शजरो शजर की चाहत मे रास्ते महज इत्तेफाक निकले ।
ठहरे जहाँ पल भर को ब आजादी ब आबोताब ,
हमारी आबादी का जनाजा लेकर लोग सब बर्बाद निकले ।
वो इन्तजार मे था के धुन्ध छटे कोई अपना दिखे ,
रोशनी हुई तो चेहरे महफूज नकाब निकले ।
वो अपने ईमान पे अकड़ता रहा ताउम्र,
कत्ले जमीर करके लोग सर उठा बेबाक निकले ।
मुद्दत गुजरी इक हमराह की चाहत मे ,
वीराने सब अस्बाब निकले ।
दौलत औ शोहरत की चाहत मे  जिन्दगी हुई खाक ,
सल्तनत से दूर फकीर बादशाह निकले ।
दिनभर की जद्दो जहद और हकीकत की मार ,
फिर आसमा पे चाँद और सैर पे कुछ ख्वाब निकले ।
काटो ये दिल जिगर तस्वीर ए विशाल ए यार निकले ,
बहे आंखो से चश्मे तर साथ लहू के शराब निकले ।

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