Poems

तेरी नाराज़गी

इतनी भी क्या नाराज़गी पगली एक बार पूछ तोह लिया होता
गुस्से से चल दी तू एक बार मुड़ के देख तोह लिया होता

सोच के देखो जो छोड़ के जाते है
वोह अक्सर रूठ जाते है

Beba ankhe

उन बेवा आंखों का आलम मत पूछो,
सूख गए हैं आंसू उन बेवा आंखों की ,
बसे थे जिनमें हजारों सपने,
टूट गए है वे सारे सपने,
बह गए हैं वे झरने सारे,
चले गए हैं दिन बहार के ,
अब तो सावन भी लगे सुखा सा ,
होली दिवाली में अब वो बात कहां ,
जीवन भी लगे सुना सुना सा ,
अब पहले जैसी बात कहां ,
सजना सवरना भी लगे गुनाह सा ,
हर पल किसी को ढूंढती है वो आंखें ……

दर्द

बेवफा जमाने को गर कहें तो कहें कैसे?
हम तो खुद के भी नही रहे हमेशा के लिए…!!!
-#चाँदनी

मुक्तक

है परिभाषित सतत संघर्ष और संग्राम अभिनंदन।
हैं हम सारे अयोध्या के निवासी, राम अभिनंदन।
वो जो हर भौंकते से श्वान का मुंह वाण से भर दे।
कि इस कलयुग में उस एकलव्य है नाम अभिनंदन।

रेत की तरह

रेत की तरह यू हाथ से छूट रहा है तू
जितना जोड़ लगाओ उतना तेज़ फिसल रहा है तू

याद रख तेरे रब ने कभी तेरा हाथ कभी नहीं छोड़ा हैं
तेरे अपनो ने कभी तुझ पढ़ हौसला न छोड़ा हैं

धुमिल लक्ष की तरफ बढ़ता जा तू
लोग जुड़ते हैं तोह ठीक वरना खुद ही उसके राह चलता जा तू

तेरे अपनो ने कभी तेरे ईमान को टटोला नहीं
तेरी चुप्पी को कभी तेरी कमज़ोरी से जोड़ा नहीं

अपने अंदर के आग को बाहर आने दे
यह जिस्म को तप के लोहा बन जाने दे

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