Poems

फकीर

ज़माने के आईने में चेहरे सभी अजीब दिखते हैं,
सच से विलग मानों जैसे सभी बेतरतीब दिखते हैं,

जब भी खुद को खुद ही में ढूंढना चाहते हैं हम,
अपने ही चेहरे पर गढे कई चेहरे करीब दिखते हैं,

ये कैसी तालीम ऐ एतबार है इस बेशर्म ज़माने की,
जहाँ मज़हब के नाम पर आपस में बटें हम गरीब दिखते हैं,

फरिश्तों से भरी इस मोहब्बत की सरज़मी पर अक्सर,
क्यों आपस में ही उलझे हुए हम पैदाइशी फ़कीर दिखते हैं।।

राही (अंजाना)

ज़मीर

यार दफन करना मुझे
आग तोह तेरे पास भी नहीं
होता तोह आज यह नौबत ना आती

यार फूलों से सजाना नहीं
कुछ तोह अपने पास रख देना
कुचलने पढ़ अपने मरहम पढ़ ओढ़ लेना

यार रोना नहीं मेरे मौत पढ़
खुश तोह अपने मौत पढ़ भी हुए थे
सपनो के लिए खुद को कुचल के जिये थे
आज सोचों तोह सपने सारे हासिल हो गए
पढ़ खुशि कहीं बेसुध सी खड़ी हैं

यार दफन करना मुझे
आग तोह तेरे पास भी नहीं
होता तोह आज यह नौबत ना आती

Kal rahe na rahe

Jalte hue abr ko zehar se bacha lo
Fiza ye meharban, kal rahe na rahe

Aab ko tezab ke kahar se bacha lo
Dariya ki fariyad, kal rahe na rahe…

Azadi ka saaz bulandi se saja lo
Inqalabi ye awaaz, kal rahe na rahe…

Girte ko kandhe ka sahara dila do
Insani jazbat, kal rahe na rahe…

Bhule kisi dil ko seene se laga lo
Sulagti koi yaad, kal rahe na rahe…

Dil ki koi baat zubaan pe utaaro
Woh itne dildaar, kal rahe na rahe…

पहला प्यार 💕

वो है बेखबर,
शायद न हो उसे खबर!
कैसे हुआ ये इश्क़ मुझे न पता चला,
इन दिनों इश्क़ इतने करीब से गुजरा की लगा बस हो गया।
आते जाते उसे देख खुद में मुस्क़ुरती हूँ।
पाने की चाह किसे है,
बस उसे जी भर देखना चाहती हूँ।
पहले तो जुबा ही बोलती थी,
पर अब तो आंखे भी बोलने लगी है!
ये आँखो की आँख मिचोली है,
यू तो बहुत कुछ बोलती है मुझसे,
पर जब तुम आते हो,
तो पगली झुक सी जाती है।
ये मन भी बड़ा चंचल है,
दौड़ता रहता पल पल है,
दिल भी तेरा, मन भी तेरा,
ये दिमाग करे तो क्या करे बेचारा।
ये दिल क्या हो गया है तुझे?
आजकल कहाँ रहते हो?
यारो के बीच रहते हुए भी खोये हुए जान पड़ते हो!
मुझे नहीं इंतजार तेरे लबो की इजहार की,
राज तो होगा दिल पे जिंदिगी भर तेरे पहले प्यार की!!
नहीं चाहिए वो सात जनमो का साथ।,
बस तुझे देख- देख गुजरते रह जाए ये दिन रात।।।।।

…… सौन्दर्य नीधि…….

ऐ इंसान सम्भल जा

एक प्रश्न है मुझे,
ये इंसान क्या हो गया है तुझे?
क्यों कर रहा है ऐसे काम,
जिससे हो रहे हो बदनाम।
क्या हक़ है तुझे,
कर रहा इस सृष्टि को नष्ट,
ये इंसान होगा तुझे ही कष्ट।
मैंने तम्हे बनया है श्रेष्ठ,
ये इंसान न कर इतना कलेश।
तुझे क्या लगता है ?? तुझसे चल रहा है यह संसार,
ये मुर्ख इंसान कर थोड़ा विचार।
तूने काट डाले सारे पौधे और पेड़,
क्यों करता जा रहा है अधेड़।
ख़त्म कर डाले तूने झील और नदिया,
कहाँ गए वो सुन्दर चहचहाती चिड़या।
ना रहा स्वच्छ ये पानी, न शुद्ध रही यह हवा,
जन्म से ही खा रहे शिशु दवा।
पैसो के पीछे भाग रहे हो तुम,
भागते भागते हो गए हो ग़ुम।
मैने दिया था तम्हे ये बुद्धि,
अब कर रहे तुम हर जंतु की शुद्धि।
मेरे लिए हर जंतु है सामान,
ये नादान इंसान ना कर इतना अभिमान।
समय है ये नादान सम्भल जा,
नहीं तो अपनी अग्नि में स्वयं ही जल जा।
तुझे होगा एक दिन प्रायाचित करना,
तुझे अपने कर्मो का फल होगा भरना।

…….. सौंदर्य निधि………

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