Poems

वो कौन है……

ये प्यारी मुस्कान आपकी पहचान बन जाए
खिलता चेहरा लोगो के लिए ये शराब बन जाए
ये होठ ये पलकें और ये गाल मानो मुझसे यह कह रहे हैं
की खोजा इन सब में और तू मेरा गुलाम बन जाए

ये झरने ये परिंदे और हवा के झोंके,
सब तेरे साथ चलने लगेंगे
तुझसे मेरी दोस्ती देख ये जमाने वाले
मुझसे जलने लगेंगे
बस तू कभी खफ़ा होने की बात न
करना मेरी दिल-ए-धड़कन
वरना तेरे साथ बिताए वो हसीं पल,
मेरे दिल को चीरने लगेंगे

दिल देने की हद हो तो ये दिल खोल के रख दूं
रूह रूह प्यासी है मेरी कहो तो जहां मे बयां कर दूं
मेरी दोस्ती का प्यार कबूल कर ए हुस्न-ए-मलिका
हस कर कह दो तो ये दुनिया तेरे नाम लिख दूं

मेरे गीत की वो मेहक कौन है
मुसकान से कत्ल की चहक कौन है
मेरी कलम की न जाने वह मोहब्बत है
फिर क्यूँ वह सवाल है ,कि वो कौन है ……..

पतंगा

पतंगे को दीपक की आहोशी में जाकर अच्छा लगा,
ज़िन्दगी को मौत की मदहोशी में आकर अच्छा लगा,

बन्द रही थी सर्द रातों में कहीं वीराने में जो मोहब्बत,
आज खुलेआम उसे गर्मजोशी में आकर अच्छा लगा,

टोकते रहे सभी मेरी खुली आवाज़ को लेकर अक्सर,
और मुझ अंधे को रौशन खामोशी में आकर अच्छा लगा।।

राही अंजाना

हमसफ़र

बस यूँही हम मिले और मिलते रहे,
थे कली फिर भी फूलों से खिलते रहे,

रिश्ते जितने ही हमसे उलझते रहे,
उतना ही प्रेम में हम सुलझते रहे,

रोका हमको बहुत हम रुके ही नहीं,
हम तुम्हे हमसफ़र अपना बुनते रहे,

वक्त की चाल से हम डरे ही नहीं,
सच यही साथ में सीढ़ी चढ़ते रहे।।

राही अंजाना

तिरंगा

अपनी हथेली पर शहीदों के नाम की मेंहदी रचाता रहा हूँ मैं,
खुद ही के रंग में शहादत का रंग मिलाता रहा हूँ मैं,

हार कर सिमट जाते हैं जहाँ हौंसले सभी के,
वहीं हर मौसम में सरहद पर लहराता रहा हूँ मैं,

सो जाती है जहाँ रात भी किसी सैनिक को सुलाने में,
अक्सर उस सैनिक को हर पल जगाता रहा हूँ मैं,

दूर रहकर जो अपनों से चन्द स्वप्नों में मिलते हैं,
उन्हें दिन रात माँ के आँचल का एहसास कराता रहा हूँ मैं,

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई किसी एक जाति का नहीं मैं,
इस पूरे भारत का एक मात्र तिरंगा कहलाता रहा हूँ मैं।।

राही (अंजाना)

माँ के लाल

एक माँ की गोद में एक माँ के लाल आ गए,
दोनों ही माँ की आँखों में आसूँ हाल आ गए,

रंग माथे दुरंगा लगा कर ख़ुशी से भेजा जिन्हें,
वो लिपटकर तिरंगे में आज बदली चाल आ गए,

सरहद पे रहे हथेली पर सांसों का दिया जलाये,
सो लगाकर देखभक्ति की अमिट मशाल आ गए।।

राही अंजाना

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