Poems

माटी मेरी प्रीत की

माटी मेरी प्रीत की पल पल पक्की होती जाये
देख जीत मेरी प्रीत की, तेरा रंग क्यों फीका पड़ता जाये

बेटी घर की रौनक होती है

बेटी घर की रौनक होती है
बाप के दिल की खनक होती है
माँ के अरमानों की महक होती है
फिर भी उसको नकारा जाता है
भेदभाव का पुतला उसे बनाया जाता है
आओ इस रीत को बदलते है
एक बार फिर उसका स्वागत करते है

बेटियाँ

पैदा होने से पहले मिटा दी जाएँगी बेटियाँ,
बिन कुछ पूछे ही सुला दी जाएँगी बेटियाँ,

गर समय रहते नहीं बचाई जाएँगी बेटियाँ,
तो भूख लगने पर रोटी कैसे बनाएंगी बेटियाँ,

जहाँ कहते हैं कन्धे से कन्धा मिलायेंगी बेटियाँ,
सोंच रखते हैं एक दिन बोझ बन जाएँगी बेटियाँ,

चुपचाप गर यूँही कोख में छिपा दी जाएँगी बेटियाँ,
तो भला इस दुनियां को कैसे खूबसूरत बनायेंगी बेटियाँ॥

राही अंजाना

अंत ही आरंभ है

बड़ रहा अधर्म है, बड़ रहे कुकर्म हैं।
इनके जवाब में आज वो उठ खड़ी।।
तोड़ कर सब बेड़ियाँ, हुंकार है भरी।
अपने स्वाभिमान के लिए है वो उठ खड़ी।
संयम त्याग कर, ललकार है भरी।
ललकार प्रचंड है, तांडव का आरंभ है।
धैर्य का टूटना आरंभ है विनाश का।
विनाश ये प्रचंड है, भयावह अब अंत है
अंत ही आरंभ है, यही तो प्रसंग है।।।

दोहा

फूटी मटकी रख दयी, माटी लेप लगाय
पानी पल पल रिस रहा, मन भी धोखा खाय।

अशोक बाबू माहौर
10 /12 /2018

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