Poems

मुक्तक

तेरी याद जब भी आस पास होती है!
मेरी जिन्दगी खामोशी से रोती है!
घेर लेता है मुझे बेबसी का मंजर,
आरजू खुद को अश्कों में डूबोती है!

मुक्तककार- #महादेव’

खुदा से

जब दिल रोए पर
अश्क ना हो ,
जब नफरत हो पर
रश्क ना हो ,
जब सजदा हो पर
दुआ ना हो ,
जब किस्सा हो पर
बया ना हो ,
जब जिन्दा हो पर
अहसास ना हो ,
तब कह दे ना खुदा से
अब तू मेरे साथ और
बदनाम ना हो !
‘निसार’

इन्तजार….

इन्तजार….

तेरा इन्तजार करू, तेरा एतबार करू लेकिन
कब तक बता यू ही सुबह से शाम करू !

तेरे बिना राहे चलती नहीं मेरी लेकिन
कब तक बता यू ही मंजिल-ऐ-राह को बदनाम करू!
‘निसार’

खोया बचपन

खोया बचपन

बचपन के  शहर मे जाने ,
क्यों  ख़ाली से मकान पड़े है
सयानेपन के हर जगह पर
ऊँचे-ऊँचे बंगले खड़े है
कुछ आधुनिकता की आड़
मे लूट गए
कुछ को मजबूरियों न
लूटा है
महँगे खिलौनो की सौदेबाजी मे,
बचपन को जाने किसने लूटा है!
कहाँ गए जाने जो
कागज की कश्ती बनाया करते थे,
नन्हे-नन्हे हाथो से मिटटी के घर बनाया
करते थे
जो पत्थर के टुकड़ो से भी खेल बनाया
करते थे !

कोई तो  उनको ढूंढ के ला दो ,
कोई तो  उनको खोजकर ला दो ,
मासूम-सा बचपन,
नादानी का वो,
कोई तो इस शहर को फिर बसा दो!
‘ निसार ‘

ग्रीष्म ऋतु

ग्रीष्म ऋतु की खड़ी दोपहरी,

सुबह से लेकर शाम की प्रहरी,

सूरज की प्रचंड किरणें,

धरती को तपा रहीं हैं,

फसलों को पका रहीं हैं ं,

गुलमोहर की शोभा निराली,

आम, लीची के बाग-बगीचे​,

खग-विहग हैं उनके पीछे,

माली काका गुलेल को ताने,

करते बागो की रखवाली,

कोयल की कूक सुहानी,

कानों में रस है घोलती,

गर्म हवाएंँ ,धूल और आँधी,

ग्रीष्म ऋतु की हैं  ं साथी,

ताल-तलैया सूख रहें हैं,

बारिश की बूंँदों की आस में,

जल वाष्प बनाकर आसमान को सौंप रहे हैं,

गोधुलि में जब सूरज काका,

अपनी ताप की गात ओढ़ कर,

घर को वापस चल देते,

चँदा मामा चाँदनी संग,

तारों से आकाश सजाते,

गर्म हवा ठंडी हो जाती,

शाम सुहानी ग्रीष्म ऋतु की,

सबके मन को है भाती,

हर मौसम का अपना रंग है,

अपने ढंग से सब हैं आते,

अपना-अपना मिजाज दिखाते,

जीवन में हर रंग है जरूरी,

हमें यह सीख दे जाते ।।

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