Poems

ढ़ूँढ रही मैं

ढ़ूँढ रही मैं बावरी,
अपने हिस्से का,
स्वर्णिम आकाश,
टिम-टिम करते तारे,
हाय! सुख-दुख के,
बन गए पर्याय ,
तम घनेरा ऐसे ,
छाय जैसे चन्द्र में
ग्रहण लग जाए,
मौसम आए मौसम जाए,
कभी न सरसो फूली हाय!
हरियाली की एक नज़र को,
तमन्नाएँ तरसती रह जाएँ,
झूम कर बारिश की आशाएँ,
बादल गरजें और बूँद-बूँद,
गिर कर रह जाए,
एक बूँद भी अगर,
मिल जाए,समझो,
जीवन तृप्त हो जाए,
ख्यालों के विस्तृत ,
दायरे में ढ़ूँढू अपना ,
परिचय मिल न पाए,
दशकों से मैं  बावरी,
ढूँढ रही अपने हिस्से,
का स्वर्णिम आकाश,
जब भी पाऊँ, धूमिल,
हीं पाऊँ, ढूँढू और,
ढूँढती हीं जाऊँ ।।

https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2016/05/18

मुक्तक

मुझको कभी मेरी तन्हाई मार डालेगी!
मुझको कभी तेरी रुसवाई मार डालेगी!
कैसे रोक सकूँगा मैं तूफाने-जख्म़ को?
मुझको कभी बेरहम जुदाई मार डालेगी!

#महादेव_की_कविताऐं’

निसार

निसार होना आसान नहीं ,
किसी का होना आसान नहीं
आस हो जो ना की
कुछ भी आसान नहीं , और
जब ना और हां का बन्धन
ना हो तो निसार होना मुश्किल नहीं !

पहचान

रिवाजो से हटकर
जो अपनी राह बना ले,
जिन्दा वही है ,
जो अपनी पहचान बना ले !

खोज…

खोजते है बचपन अपना ,
ढूंढते है नादानी अपनी ,
कूड़े के ढ़ेर को समझते है
कहानी अपनी !
देखकर मुझको वैसे तो दया सब
दिखाते है, पर
जब कोई गलती हो जाए, तो
पढ़े-लिखे बाबू भी गालियां दे जाते है !
कोड़े का ढ़ेर किसी को पैदा नहीं करता , साहब
हम भी किसी की ओलाद है
सिर्फ गरीबी के नहीं मारे हम,
हम आप सबकी ख़ामोशी के भी शिकार है !
इसलिए कोड़े के ढ़ेर मे बचपन खोज रहे है,
गलतफहमी है की कूड़ा बीन रहे है !

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