Poems

4 Liner#4

क्यों नहीं कहता जो फ़साना है तेरा ये कैसा बेमान अफसाना है तेरा
क्यों बना बैठा है वो बुत जो पूजा जाये ये किसकी परस्ती है की वो छा जाये
क्यों नहीं तोड़ता तू ये तमाम बेड़ियांक्यों नहीं छोड़ता तू ये तमाम देहरियां
तेरी बेईमानी तेरा इमान क्यों है ऐ दिल, तू इतना बेजुबान क्यों है

LIFE

Life yes it has changed and is going to change too as the time passes by,
Many people I knew just left but m glad to have the ones who stood by,
Like every other phase this one will end too,
But I guess till then I’ll be left with only few,
My belief on friendship is still firm and strong,
Due to the ones who love me even if m wrong,
Life is just like a beautiful song with notes high and low,
So m going to stand strong no matter how strongly life blow,
Among others m a human being too with the emotions so high,
I too enjoy being happy and I too feel the sigh,
I hate it when life takes my exams but still I manage to pass,
Love is something which I have plenty in my life,
But don’t know how hatred turns out to be its wife,
My life is none of your concern so I don’t need your view,
People turned out to be unknown whom I think I knew,
Sometimes I just simply cry,
And sometimes I cant even if I try,
Life yes it has changed and m waiting to see some more,
Some changes will change me and the rest I’ll just ignore…

जब भरोसा उठ जाए, तो खुद के पास खुदा रखना

तुम अपने गिर्द हिसारों का सिलसिला रखना
मगर हमारे लिये कोई रास्ता रखना

ज्यादा देर तक जुल्म नहीं सह सकता मैं
अब अगर आयें कडे दिन तो दिल कडा रखना

तुम्हारे साथ सदा रह सकें जरूरी नहीं
अकेलेपन में कोई दोस्त दूसरा रखना

वो कहते हैं न कि जिसका कोई नहीं खुदा होता है
जब भरोसा उठ जाए, तो खुद के पास खुदा रखना

छु न सके हथियार

छु न सके हथियार जिसे, उसे वो नजरो से घायल करते रहे,,
हम भी बने हिम्मती इतने,, वो वार करते रहे, हम हलाल होते रहे!!
कल तक मिल्कियत की जिसकी मिसाले देता था जमाना,
उसे ही वो होठों के जाम पिलाते रहे,, हम भी शौक से पीते रहे!!
कुछ तो बात हैं कान्हा, जो सितारे उसे चंदा समझ लेते हैं अक्सर,,
काश!! वो भी मेरी ख़ामोशी समझ पाए और  हम भी उन्हें देखते रहे!!

कोई खिडकी न खुले और गुजर जाऊं मैं

हादसा ऐसा भी उस कूचे में कर जाऊं मैं
कोई खिडकी न खुले और गुजर जाऊं मैं

सुबह होते ही नया एक जजीरा लिख दूं
आज की रात अगर तह में उतर जाऊं मैं

मुन्तजिर कब से हूं इक दश्ते करामाती का
वह अगर शाख हिला दे तो बिखर जाऊं मैं

जी में आता है कि उस दश्ते सदा से गुजरूं
कोई आवाज ना आये तो किधर जाऊं मैं

सारे दरवाजों पे आईने लटकते देखूं
हाथ में संग लिये कौन से घर जाऊं मैं

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