Poems

तूं मेरा आधार है…………..

है कठिन जीवन बहुत,

चहुं और हाहाकार है

बोझ घर का सर पे है,

हर चीज की दरकार है।

बहन शादी को है तरसे,

भाई तक बेकार है

मात—पिता चुप हैं दोनों,

थक चुके लाचार हैं।

मैं अकेला लड रहा हूं,

तीर ना तलवार है

खट रहा हूं, बंट रहा हूं,

घुट रहा घर—बार है।

हौंसला देता है मुझको,

एक तेरा प्यार है

तूं जमीं, तूं आस्मां,बस,

तूं मेरा आधार है।

——-सतीश कसेरा

मेरे दर्द को तो नहीं छुआ……..

अच्छा हुआ या बुरा हुआ

सब पहले ही से है तय हुआ।

कोई दूर से रहा ताकता

कोई पास हो के भी न हुआ।

मेरे दिल पे हाथ तो रख दिया

मेरे दर्द को तो नहीं छुआ।

मेरी बात वो समझा नहीं

जो कहा था मैने बिन कहा।

मुझे अब भी उसकी तलाश है

जो मुझमें है कहीं गुम हुआ।

———सतीश कसेरा

अब बियाबान मेंं जी लगता है……..

यहां कोई न भला लगता है

अब बियाबान मेंं जी लगता है।

आ के शमशान में है ढ़ेर हुआ

वो उम्र भर का चला लगता है।

तुम भी ले आये क्या नकाब नई

आज चेहरा तो बदला लगता है।

आप ऐसे न छुआ कीजे मुझे

मेरे अंदर से कुछ चटकता है।

गरीबी जब से है जवान हुई

घर का दरवाजा बंद रहता है।

छोडिय़े, उसको कहां ढूंढेंगे

जो कहीं आस्मां में रहता है।

………सतीश कसेरा

कोई तो दे दो वजह जीने की…..

कोई तो दे दो वजह जीने की

वरना मत पूछो वजह पीने की।

दर्द अब आ गया है सहना तो

क्या जरुरत है जख्म सीने की।

मेरी खता नहीं तो कैसी सजा

बात कुछ तो करो करीने की।

कोई कह दे कि याद करते हैं

आग बुझ जाये कुछ तो सीने की।

न गले लग के अब मिले हमसे

न फिर आई महक पसीने की।

———सतीश कसेरा

 

दोस्त, दुश्मन तमाम रखता हूं……

दोस्त, दुश्मन तमाम रखता हूं

मैं हथेली पे जान रखता हूं।

शाम तक जाम क्यूं उदास रहे

मैं तो अपनी ही शाम रखता हूं।

कफन खरीद के है रखा हुआ

आखिरी इन्तजाम रखता हूं।

जब भी चाहे उजाड़ देना मुझे

मैं जरा सा सामान रखता हूं।

मैं किसी काम का नहीं क्यूंकि

काम से अपने काम रखता हूं।

मुझे तो इसलिये बदनाम किया

मैं शहर में जो नाम रखता हूं।

……….सतीश कसेरा

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