Poems

खुदा का घर है आसमान, वो रहे रोशन——————-

खुदा का घर है आसमान, वो रहे रोशन——————-

पता करो कि कहां, किसने जाल फैलाया
सुबह गया था परिन्दा वो घर नहीं आया।

रोशनी में ही चलेगा वो साथ—साथ मेरे
कितना डरता है अंधेरों से ये मेरा साया।

मेरी आहट को सुनके बंद रही जब खिडकी
बडी खामोशी से मैं उसकी गली छोड आया।

धूप में जलते हुए उससे ही देखा न गया
पेड मेरे लिये कुछ नीचे तलक झुक आया।

मुझे पता था कि तूफान यूं न मानेगा
मैं अपनी कश्ती डूबो करके घर चला आया।

खुदा का घर है आसमान, वो रहे रोशन
कि डूबा जैसे ही सूरज, तो चांद उग आया।
.———————————————सतीश कसेरा

जिंदगी मेरी जिंदगी से परेशान है

जिंदगी मेरी जिंदगी से परेशान है

जिंदगी मेरी जिंदगी से परेशान है
बात इतनी है कि लिबास मेरे रूह से अनजान है­­

तारीकी है मगर, दिया भी नहीं जला सकते है
क्या करे घर में सब लाक के सामान है

ऐसा नहीं कि कोई नहीं जहान में हमारा यहां
दोस्त है कई मगर, क्या करें नादान है

कोई कुछ जानता नहीं, समझता नहीं कोई यहां
जो लोग करीब है मेरे, दूरियों से अनजान है

घर छोड बैठ गये हैं मैखाने में आकर
कुछ नहीं तो मय के मिलने का इमकान है

ढूढ रहा हूं खुद को, कहीं कभी मिलता नहीं
चेहरे की तो नहीं, मुझे उसके दिल की पहचान है

गुजर जायेगी जिंदगी अब जिंदगी से क्या डरना
जो अब बस पल दो पल की मेहमान है

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शिक्षा

हम सबकी तरफ से हर-एक अध्यापक-गुरुजन  को सादर नमन

 

हैं पावन दिवस आज, करते हैं हम उनको प्रणाम,

जो ज्ञान की लौ जला कर मन अलौकिक करते रहते।

जन्म दिया माँबाप ने और राह दिखलाई हैं सबने,

सबके आशीर्वाद से ही हम हैं आगे बढ़ते रहते॥

 

जिन्दा रहने का असल अंदाज सिखलाया इन्होने।

ज़िन्दगी हैं ज़िन्दगी के बाद बतलाया इन्होने।

खुद तो तप की अग्नि में जल कर हैं बनते रहते कोयला,

पर जहाँ को कोहिनूर मिला सदा इनकी खानों से ॥

हमने तो माँगा था फल पर दी सदा इन्होंने ‘गुठली’,

अपमान सा हमको लगा पर हो अंकुरित ‘कल्प’ निकली।

उसी वृक्ष की छांव में हम नित्य बनाते बसेरे,

पर उसे ही भूल जाते जो जड़ो में हैं समेटे॥

जन्म दिया माँ बाप ……….

हैं पावन दिवस……….

 

आज जब देखा खुद को ज्ञान की गलियों में “अंकित”।

विचित्र सी तबीयत खिली पर ख्वाब दिल में पनपे शंकित।

शिक्षा जो पानी की भांति होनी थी सब के लिए पर,

आवश्यक तत्व होने पर भी प्रतिरूप पानी बनाना काल्पनिक॥

शिक्षा बनी व्यापार केंद्र, इसे बेचने सब आपाधाप निकले।

औरो से क्या अरमां रखे जब सरकारी सब के बाप निकले।

आश है, विश्वास हैं, अब आकुल सुंदर-सौरभित सुरभि पर,

तम में ज्ञान-दीप जला कर कमनीय-कीर्ति गौरव गिरिवर निकले॥

जन्म दिया माँ बाप ……….

हैं पवन दिवस……….

 

सस्वर पाठ:

तो हैं नमन उनको की जो यशकाय को अमृत्व दे कर,

इस जगत में शौर्य की जीवित कहानी हो गए हैं।

तो हैं नमन उनको जिनके सामने बौना हिमालय,

जो धरा पर रह कर भी आसमानी हो गए हैं।

मुक्तक 13

चला जाता है कोई दूर ,दिल के पास रहता है ,
वही यादें ,वही खुशबू ,वही एहसास रहता है .

फ़कत इतना फरक है प्रेम के इन दो मिलापो में ,
की जब वो दूर होते है तो ग़म ये साथ रहता है ..

…atr

मुक्तक 12

खत को मेरे संभाल के रखा जो होता मीर,
हर हर्फ़ मेरे प्यार की दास्ताँ कहते .
करे अब किस जगह रोशन गुलिश्ता ए जिगर को यार ,
यहाँ तो आशियाँ ही लुट गया है मीर तूफां में .

…atr

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