Poems

“मैं”-१

वक्त की कलम से जिन्दगी के हँसी पल लिखने जा रहा हूँ मैं,
गमों की परछाई पर खुशियों के साये सा छाने जा रहा हूँ मैं,
गर समझ हो तो आ जाना मेरे साथ , वरना अपना ही साथ आजमाने जा रहा हूँ मैं,

“शायर का सपना”

"शायर का सपना" »

“मोहब्बत” #2Liner-65….

ღღ__बिछड़कर देर तक तुझसे, उस दिन मैं सोंचता रहा “साहब”;
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मोहब्बत गर ना हुई होती तो, मेरा क्या हुआ होता !!……‪#‎अक्स‬
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ये ख्वाइशें

रेत के महलों की तरह ,हरदम ढहती है ये ख्वाइशें
फिर भी हर पल क्यों सजती सवरती है ये ख्वाइशें

उम्मीदे इन्ही ज़िंदा रखती सांसों में रचती -बसती
पलती-बढ़ती सब चुपचाप सहती है ये ख्वाइशें

एक खवाइश पूरी होते ही अपनी कोख से
दे जाती जनम कोख में पलती है ये ख्वाइशें

इन्हे पूरा होने की आस में रहते बैचेनी की गोद में
जाने -अनजाने दर्द से आलिंगन चाहती है ये ख्वाइशें

कभी होगा खत्म इन ख्वाइशों का अनवरत क्रम
जिंदगी का है अंत पर अमर होती है ये ख्वाइशें

हर खवाइश बंधी आशा की सुनहरी जंजीरों से
जिसे तोड़ने की खवाइश भी ,जन्म देती चंद नई ये ख्वाइशें

कौन कहता है होती नहीं इन ख्वाइशों की जुबान
हर पल टूटती न जाने ,क्या चीखती है ये ख्वाइशें

शायद इन ख्वाइशों और धड़कनों का नहीं कोई रिश्ता
मर जाता है इंसान, पर मरती नहीं है ये ख्वाइशें

लगता इन ख्वाइशों का सच अपनी समझ से परे ‘अरमान’
शायद यही ज़िंदगी है कुछ उम्मीदें और अनंत है ये ख्वाइशें

हम उन लम्हों

हम उन लम्हों की याद को
जेहन में यु संजोये बैठे है
रहकर भी दूर जैसे
आँखों में बसता है कोई
उन लम्हों की सांसें हमें
हरदम चलती नज़र आती है
जो अहसास कराती है अपने
और लम्हो के जीवित होने का
लगता इन लम्हो की धड़कन
रूक जाने से शायद
रुक जाएगी मेरी धड़कन भी
सोचता हूँ क्या बात है खास
उन बीत गए लम्हो में
क्यों इन्हे सजोने की इच्छा
इस कदर रखता हूँ मैं
आखिर क्यों उन लम्हो को
कफ़न ओढ़ा दफ़न नहीं कर पाता
शायद कोई ठोस कारण है इसका
शायद इसे दफ़न नहीं कर पाता इसलिए
क्योकि ये मेरे जीवित होने का
जीवंत भ्रम पालने के लिए
लगता एक अनिवार्य दस्तावेज बन गया है
राजेश ‘अरमान’२३/०७/१९८९

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