Poems

ख़ुद जीता और दूसरों को जीवा जाता

झुका के मन को जीना सिखा जाता

ख़ुद जीता और दूसरों को जीवा जाता

अकड़ तेरी किस कम की निकली

जिसने तेरी सारी हस्ती ही निगली

                         …… यूई

है यह नियम कुदरत का

है यह नियम कुदरत का

जो भी यहां अकड़ता  है

छोटे से झोंके सह ना पाता

टूटता वोह सबसे पहले  है

                         …… यूई

झुकना है दरबार में जाके

झुकना है दरबार में जाके

फिर क्यों इतनी हांके तू

उसको जो पसंद है बंदिया

उसको क्यों ना जाने तू

                         …… यूई

तू तुच्छ सा जीव ओ बंदिया

तू तुच्छ सा जीव ओ बंदिया

किस बात पे इतना अकड़ता तू

पल भर की तेरी हस्ती नही है

किस बात पे इतना इतरता तू

                         …… यूई

निम्न मन ही तो सबको अपना पता

झुकना है निशानी मन निमाने की

निम्न मन ही तो सबको अपना पता

निम्न मन ही तो सब सच जान पता

निम्न मन ही तो असल में जी पाता

                         …… यूई

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