Poems

टूटे कंगन बोल रहे मेरा न्याय करेगा कौन

मित्रो! अभी हाल ही मे शहीद हुए हमारे देश के चार सैनिको
को ,अपनी कविता के माध्यम से श्रद्धासुमन अर्पित करते हुये, मैने आप तक ए कविता पहुचाने की कोशिश की है
अगर आपको ये कविता पसंद आये तो ये बात देश के अन्य लोगो तक पहुचाने की कोशिश करे।
जय हिंद जय भारत

टूटे कंगन बोल रहे मेरा न्याय करेगा कौन ।
मांगो के सिंदूर पूछते यह अन्याय भरेगा कौन ।।

सीमा पर से उस प्रहरी की आवाजे है चीख रही।
मेरे बलिदानो की बोलो कीमत भला भरेगा कौन।।

मै भारत का कलमकार हू
अपनी भाषा बोल रहा हूँ ।
प्रजातंत्र के सरदारो से
नया प्रश्न अब खोल रहा हूँ।।

कब तक मौन रखोगे अपनी
चमक ढाल तलवारो की ।
कब और दंश सेना के ऊपर लगते जायेंगे
कब तक कायर दुश्मन के हम रोज तमाचे खाएंगे।।

कब तक मांग भरी, बिधवाए
सिंदूरो को पोछेंगी।
कब तक माँ ये बेटो के हित
ह्रदयस्थल को नोचेंगी ।।

 

कब तक बहना की राखी का
अग्निध्वंश करवायेंगे।
कुछ तो बोलो कब तक
सैनिक की लाशे उठवाएंगे।।

चार बीर बलिदानों का
यह घाव कौन हर सकता है।
सिंदूरो से सजी मांग
अब भला कौन भर सकता है।।

कौन जोड़ पायेगा वह दिल
माँ का जो शीशे सा टूट गया।
कीमत कौन चुकायेगा उन हाथों का
जो राखी को लिए खड़ी बहना से भी छूट गया।।

वह तो है नादान पड़ोसी
न जाने किस पर ऐठा है।
दो बार लात खा करके भी
फिर आघातों को बैठा है।।

दो ,दो बार माफ करने का
यही नतीजा आया है।
गाँधीवादी अरमानो ने
फिर से थप्पड़ खाया है।।

सत्य अहिंसा को अपनाकर
मतलब इसका भूल गये।
भूल गये कुर्बानी उनकी
फाँसी पर जो झूल गए।।

जब जब अपना इतिहास भूल
गाँधीवादी अपनाओगे।
तब तब धुश्मन के हाँथो से
थप्पड़ खाते जाओगे।।

सत्य अहिंसा क्या होती है
मर्यादा को भूल गये।
गाँधीवादी राह पकड़ ली
प्रभु राम को भूल गये।।

भूल गये तुम सत्य अहिंसा
भारत की परिपाटी है।
लेकिन रण मे पीठ दिखाना
कायरता कहलाती है।।

क्षमा सत्य उसके खातिर
जो मानवता का रक्षक हो।
उसके खातिर वध निश्चित है
जो मानवता का भक्षक हो।।

अधिक क्षमा करना भी निज मे
कायरता कहलाती है।
अधिक अहिंसा का पालन
निज प्रत्याघात कराती है।।

स्वाभिमान के खातिर अहि मे
बिष का भान जरूरी है।
दुष्ट दलन के खातिर फिर अब
दंण्ड विधान जरूरी है।।

याद करो गीता की वाणी
जो केशव ने गायी थी।
याद करो प्रभु राम गर्जना
जो सागर को समझाई थी।।

हे भारत के पार्थ आज तुम
महाभारत को भूले हो।
इसीलिये बलिदान हुए सर
और शर्म से झूले हो।।

समय नही है सीमा पे अब
श्वेत कपोत उड़ाने का ।
न ही रंग गुलाबी लेकर
फागुन गीत सुनाने का।।

भारत माँ के अमर पुत्र
गांण्डीव उठा टंकार करो।
शांति यज्ञ की पूजा छोड़ो
दुश्मन पर अब वार करो।।

छप्पन इंची सीना वाले
उठो नया हुंकार भरो।
सीमाओ पर तोपें दागो
आर करो या पार करो।।

जय हिंद जय भारत
आपका ——–अखिलेन्द्र तिवरी (कवि)
sri raghukul vidya peeth civil line gonda
uttar pradesh
तुलसी जन्मभूमि राजापुर गोण्डा (उत्तर प्रदेश)

✋✋✋✋माँ का आशीर्वाद✋✋✋✋✋✋✋

दास्तान

इक दास्तान है दबी दिल में कहीं
कोई सुने तो हम सुनाये कभी|

Kya??

mauz e zindgi humari unhei achi nhi lagti Kya…
Jo takleefo k farman bejwa deti Hai wo..

cherei par hasi humarei haseen nhi lagti Kya..
Jo sikan ki lakire la deti Hai wo..

raat ko aankh band krnei ki rshm thi Jo wo, ab nhi hoti kya ..
jo nindo sei b ab jaga deti Hai wo…

mar mar k ji raha hun itna hi kaafi nhi Kya…
Jo ab meri dhadkano ko b thaam deti Hai wo..

Kya??

mauz e zindgi humari unhei achi nhi lagti Kya…
Jo takleefo k farman bejwa deti Hai wo..

cherei par hasi humarei haseen nhi lagti Kya..
Jo sikan ki lakire la deti Hai wo..

raat ko aankh band krnei ki rshm thi Jo wo, ab nhi hoti kya ..
jo nindo sei b ab jaga deti Hai wo…

mar mar k ji raha hun itna hi kaafi nhi Kya…
Jo ab meri dhadkano ko b thaam deti Hai wo..

तनहा

इश्क़ में हैं गुज़रे हम तेरे शहर से तनहा,
महब्बत के उजड़े हुए घर से तनहा!

हम वो हैं जो जीये जिंदगी भर से तनहा,
और महशर में भी जायेंगे दहर से तनहा!

तख़्लीक़े-शेर क्या बताऊ कितना गराँ हैं,
होना पडे हर महफ़िल-ओ-दर से तनहा!!

तुफानो-बर्क़ो-खारो-मौज़ो से निकलकर,
हम निकले गुलशनो-दश्तो-बहर से तनहा!

हम हैं वही जिसे कहता हैं ज़माना शायर,
दुनिया में है मक़बूल हम नामाबर से तनहा’!

तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’

मुक्तक

तेरी चाहत मेरे गुनाह की तरह है!
तेरी तिश्नगी दिल में आह की तरह है!
खींच लेती है खुशबू तेरे ख्यालों की,
तेरी याद बेखुदी की राह की तरह है!

मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

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