Poems

अंत ही आरंभ है

बड़ रहा अधर्म है, बड़ रहे कुकर्म हैं।
इनके जवाब में आज वो उठ खड़ी।।
तोड़ कर सब बेड़ियाँ, हुंकार है भरी।
अपने स्वाभिमान के लिए है वो उठ खड़ी।
संयम त्याग कर, ललकार है भरी।
ललकार प्रचंड है, तांडव का आरंभ है।
धैर्य का टूटना आरंभ है विनाश का।
विनाश ये प्रचंड है, भयावह अब अंत है
अंत ही आरंभ है, यही तो प्रसंग है।।।

दोहा

फूटी मटकी रख दयी, माटी लेप लगाय
पानी पल पल रिस रहा, मन भी धोखा खाय।

अशोक बाबू माहौर
10 /12 /2018

इन्तेहा

थक गया देखते देखते राह तेरी
आँसू भी बहने लगे आँख से मेरी

एहसास

तेरी तस्वीर बनाने में जब भी जुट जाया करता हूँ,
खुद ब खुद ही जाना तुझसे जुड़ जाया करता हूँ,

रंगों की समझ रखता नहीं हूँ शायद यही सोचकर,
एहसासों का ही अंग तुझपे जड़ जाया करता हूँ,

पहचान नहीं कर पाती जब तुम अपनी खुद से,
चलाकर अपनी ही तुझसे अड़ जाया करता हूँ।।

राही अंजाना

चुनावों के इस मौसम में

चुनावों के इस मौसम में
फिजा में कई रंग बिखरेंगे
अगर कर सके हम अपने मत का सही प्रयोग
हम नये युग में नयी रोशनी सा निखरेंगे

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