Poems

फुरक़त

जब फुरक़त हुई तोह पता चला
फुरसत से अगर तुझे चाहा होता

असर

अब तो हमसे कोई और सफर नहीं होता,
क्यों भला उनसे अब भी सबर नहीं होता,

सब पर होता है बराबर से के जानता हूँ मैं,
एक बस उन्हीं पे मेरा कोई असर नहीं होता,

याद रह जाता गर प्यार में कोई सिफ़त होता,
खत्म हो जाता इस तरह के वो अगर नहीं होता,

रह के आया हूँ मैं उनकी हर गली सुन लो,
मान लो ये ‘राही’ वरन यूँ ही बेघर नहीं होता।।

सिफ़त – गुण
राही अंजाना

Tu man ki ati bholi ma

तू मन की अति भोली मां,
दूजा नहीं तुझ सा प्यारा मां,
ऊपर वाले की सूरत में,
तू ही तू बस दिखती मां ,
मुझे जब नींद न आती ,
लोरी गा कर तू सुलाती मां,
मुझे जब भी भूख सताती,
झट से तू खाना दे देती,
मुझे जब कोई कष्ट होता ,
खुद बेचैन हो जाती मां ,
तू ही मंदिर तू ही मस्जिद,
तू ही है गुरुद्वारा मां ,
तेरे चरणों के सिवा
और कहीं न जाना मां ,
ऊपर वाले की सूरत में ,
तू ही तू बस दिखती मां|

जंग

अपने आप से ही एक जंग जारी रक्खा करो,
खेल कोई भी हो पर अपनी बारी रक्खा करो।।

दुश्मन हर कदम पर बैठे हैं नज़रें गढ़ाए यहाँ,
होसके तो दुश्मनी में भी कहीं यारी रक्खा करो।।

फैलाकर हाथों को यूँ ज़रूरी नहीं हो मुराद पूरी,
खुदा के दरबार में कोई बात तो खारी रक्खा करो।।

छिपाकर चेहरा भला कब तक रहोगे इस बस्ती में,
के बनाकर कोई तो पहचान ‘राही’ भारी रक्खा करो।।

#राही अंजाना#

कठपुतली

दिल ने धड़कन की ही मान लो के अब सुनना छोड़ दी,
स्त्री को नचाया जबसे इंसा ने कठपुतली बुनना छोड़ दी,

देखती ही रहीं आँखों की दोनों पुतलियाँ एक दूजे को,
उँगलियों के इशारों पर हाथों ने सुतली चुनना छोड़ दी।।

राही अंजाना

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