Poems

मुक्तक

मैं तेरी मुहब्बत को पाना चाहता हूँ!
मैं तेरी निगाहों में आना चाहता हूँ!
दीवानगी मचल रही है तेरी जिगर में,
मैं तुमको जिन्दगी में लाना चाहता हूँ!

मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

निकल जाऊंगा

सोंचा नहीं था समन्दर के इतना किनारे निकल जाऊंगा,
जिनसे डरता था उन्हीं लहरों के सहारे निकल जाऊंगा,

जहाँ बनाता ही नहीं बह जाने के खौफ से रेत के मकाँ कोई,
वहीं शौक से किरदार को अपने यूँही जमाकर निकल जाऊंगा॥
राही (अंजाना)

मुक्तक

मैं तेरे दर्द को ईनाम समझ लेता हूँ!
मैं तेरी याद को पैगाम समझ लेता हूँ!
ढूढता हूँ जब भी मदहोशी पैमानों की,
मैं तेरी अदाओं को जाम समझ लेता हूँ!

मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

स्वाभिमान का आवाहन

तिरंगे के नीचे शान्ती के घोष में,

मिशाले जलाली खूब हमनें!!

मान मर्यादा स्वाभिमान का आवाहन,

हाथो में बंदूके तलवारें उठाना हमकों!!

इतियास दुहरा रहा गजनी की चाल,

फिर से वगदादी दुहरा रहा हैं !!

नवयुवको का ब्रेनवास करकें वो,

भारत के ख़िलाफ़ हथियार जमा रहा हैं!!

खुले आकाश के नीचे वो ,

देशद्रोह के नारे लगवा रहा हैं !!

आंतकवादी अफजल कसाव को वो ,

शहीद कलाम पढवा रहा हैं !!

कश्मीर सरजमीं पर लहरातें,

आई ए एस के झण्डे लहरा रहा हैं !!

युवको के चहरे के पीछे वो,

देशद्रोह की शादशे खेल रहा हैं !!

देश प्रेमी के आँखो में खून उवला,

देश के गद्दारो को सरे आम झुलाना हैं !!

एक पल ठहर कर विचार कर ??

देना हैं शंतरज के खिलाङी को मात!!

चाबुक हे जिसके हाथो में वो,

उस शीष को काट गिराना हैं !!

आई ए एस घुषपेठ को हमकों ,

भारत के जङ से मिटाना हैं !!

सुनो नौ जवानो मेरे देश के बंदे,

वीर गाथायें हमसे हिसाव चाहती हैं !!

खून बहाकर क्या 2 जुल्म सहकर,

हमनें तब आज़ादी पाई थी !!

अब और कोई गजनी बगदादी ,

ईरान जैसे वगदाद न बना पायें !!

चुन चुन कर गद्दारो को देश से ,

नरक परलोक पहुँचाना हैं !!

अधर्म पर धर्म का विजय घोष बजा,

सविधान की बेङियों को खोल दो!!

देश में देशद्रोह कहने वालों को ,

सुस्ती कार्यवाई को चुस्त फ़ैसला कर दो!!

जिन हाथो में शान्ती की मिशालें,

उन हाथों में बंदूके तलवारे देखोगें !!

हर घर से देशप्रेम के बंदे,

मुख से बंदे मातरम बंदे मातरम…..

हाथों से बंदूके तलवारें वोलेगी !!!!!

THOSE EYES! TO DIE WITHOUT…..

जब मेरी तेरी बात हो, लब्ज़ों को आराम हो
बस आँखों ही आँखों में,अपनी दुआ सलाम हो

कभी दूर से देख के मुझको, मन ही मन मुस्काती है,
और बुलाती पास मुझे, पलकों के परदे सरकाती है
जैसे हर निमिष के संग, ढली सुबह से शाम हो

हर अच्छे-बुरे की समझ इन्हे, एक चुटकी में परख लेती है
करीब से छू के अंतर्मन को, हर भाव का रस चख लेती है
कोई जो इनको पीना चाहे, उसका तो काम तमाम हो

जब भी मनआँगन में गूंजी, बिजली सी बन कर बातें
तीर चलाती है अश्को के, तेरे नैनो की बरसाते
हर बूँद में कोई भूली बिसरी यादो का पैगाम हो ,

कहती रही इशारो में, न लायी राज जुबान पर
कैसे भला करे भरोसा, ऐसी आँखों के बयान पर
हर गुस्ताखी माफ़ इन्हे, चाहे कितने इल्जाम हो

चुपचाप संजो कर सपनो को, तड़के नींद से जगती है
उमंगो का जाल बिछा कर, बड़े प्यार से ठगती है
लेकिन इनकी सच्चाई के आगे छोटा हर दाम हो

शर्माती है तारीफें सुन के, कभी चढ़ता इनका पारा है
कभी देखती है रौनके,कभी खुद ही एक नज़ारा है
है मंजूर कैद अब इनकी,चाहे चर्चा सरेआम हो

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