Poems

दिल ले लेना

दिल ले लेना , दिल दे देना
यह बच्चों का ,खेल नहीं ।
लाख जमाना कुछ भी करले,
साथ न पल भर भी छूटे ।
जानकी प्रसाद विवश
प्यारे मित्रों,
मंगलमय प्रभात की
सर्व सुखकारी
मंगलकामनाएँ,
सपरिवारसहर्ष स्वीकार करें ।

आपका अपना मित्र ,
जानकी प्रसाद विवश

अच्छाई नहीं मिलती

झूठों की नगरी है साहब, यहाँ सच्चाई, नहीं मिलती….
बुराई के हैं अनगिनत किस्से, पर अच्छाई, नहीं मिलती….

आधे घंटे मे पहुँच जाता है, लोगों के घरों मे पिज़्ज़ा जनाब,
लेकिन वक़्त पर मरीज़ों को फिर भी दवाई, नहीं मिलती….

सर्द रातों मे सड़कों पे ठिठुर रहें हैं इंसान यहाँ पर,
सुकून की नींद तो वो भी सो जाए, पर रज़ाई, नहीं मिलती….

यूँ तो हर रोज़ हर गली हर नुक्कड़ पर होते है दंगे यहाँ,,
फिर भी महाभारत-रामायण सी धरम की लड़ाई, नहीं मिलती….

तिजारत बन कर रह गयी है, शिक्षा आज के जमाने मे,
गुरुकुलों मे होने वाली वो शास्त्रों की पढ़ाई, नहीं मिलती….

मिलावट के इस दौर मे, कुछ भी अच्छा नहीं मिलता ‘हरीश’,
गाय-भैंस तो आज भी वही हैं, पर वो मलाई, नहीं मिलती….

सिसक रही इंसानियत को हो सके तो बचा लो वतनवासियों,
लुटी जो कहीं किसी की आबरू, तो भरपाई, नहीं मिलती….

अच्छाई नहीं मिलती

झूठों की नगरी है साहब, यहाँ सच्चाई, नहीं मिलती….
बुराई के हैं अनगिनत किस्से, पर अच्छाई, नहीं मिलती….

आधे घंटे मे पहुँच जाता है, लोगों के घरों मे पिज़्ज़ा जनाब,
लेकिन वक़्त पर मरीज़ों को फिर भी दवाई, नहीं मिलती….

सर्द रातों मे सड़कों पे ठिठुर रहें हैं इंसान यहाँ पर,
सुकून की नींद तो वो भी सो जाए, पर रज़ाई, नहीं मिलती….

यूँ तो हर रोज़ हर गली हर नुक्कड़ पर होते है दंगे यहाँ,,
फिर भी महाभारत-रामायण सी धरम की लड़ाई, नहीं मिलती….

तिजारत बन कर रह गयी है, शिक्षा आज के जमाने मे,
गुरुकुलों मे होने वाली वो शास्त्रों की पढ़ाई, नहीं मिलती….

मिलावट के इस दौर मे, कुछ भी अच्छा नहीं मिलता ‘हरीश’,
गाय-भैंस तो आज भी वही हैं, पर वो मलाई, नहीं मिलती….

सिसक रही इंसानियत को हो सके तो बचा लो वतनवासियों,
लुटी जो कहीं किसी की आबरू, तो भरपाई, नहीं मिलती….

मुक्तक

मुक्तक

मुझसे किसलिए तुम रिश्ता तोड़ गये हो?
मेरी चाहत को तन्हा छोड़ गये हो!
यादों की आहट रुला देती है मुझको,
#साँसे_जिस्म को गमों से जोड़ गये हो!

#महादेव_की_मुक्तक_रचनाऐं

ठण्डी के बिगुल

शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के,
मौसम ने यूं पलट खाया,
शीतल हो उठा कण-कण धरती का,
कोहरे ने बिगुल बजाया!!

हीटर बने हैं भाग्य विधाता,
चाय और कॉफी की चुस्की बना जीवनदाता,
सुबह उठ के नहाने वक्त,
बेचैनी से जी घबराता!!

घर से बाहर निकलते ही,
शरीर थरथराने लगता,
लगता सूरज अासमां में आज,
नहीं निकलने का वजह ढूढ़ता!!

कोहरे के दस्तक के आतंक ने,
सुबह होते ही हड़कंप मचाया,
शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के
मौसम ने यूं पलटा खाया!!

दुबक पड़े इंसान रजाईयों में,
ठण्ड की मार से,
कांप उठा कण-कण धरती का
मौसम की चाल से!!

बजी नया साल की शहनाईयां,
और क्रिसमस के इंतज़ार में,
झूम उठा पूरा धरती,
अपने-अपने परिवार में!!

शंख बजे ज्यों ही ठण्डी के,
मौसम ने यूं ही पलट खाया,
शीतल हो उठा कण-कण धरती का,
कोहरे ने बिगुल बजाया!!

सुशील कुमार वर्मा
सिन्दुरियां,महराजगंज,गोरखपुर

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