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  • saundaryanidhi1 posted an update 1 week, 4 days ago

    मेरी पहली कविता
    बेनाम बच्चे
    एक सुबह , स्कूल की सैर,
    उस दिन रुक गये मेरे पैर।
    देखा कुछ ऐसा,
    विश्वास नहीं हुआ वैसा।
    छोटे – छोटे हाथों में बड़े – बड़े प्याले,
    खोटे सिक्कों से भरे हुए थाले।
    आखों में झलकती पेट की भूख,
    परिवार के जिम्मेदारी में निभाते सुख – दुख।
    ऐसे बच्चें जिनके शौक नहीं होते,
    हां, हां वहीं बच्चे जो जवान ही पैदा होते।
    ना पढ़ाई, ना लिखाई, ना खेल कूद ,
    गरीबी में दबे, अपने माता-पिता की भूल।
    छोटे – छोटे आखों में बड़े – बड़े सपनों को,
    भाग – दौड़ भरी दुनिया में ढूंढते अपनो को।
    हां, हां वहीं बच्चें हैं हमारे देश की भविष्य,
    आज बने हुए हैं खुद ही रहस्य ।
    ऐ खुदा, सुना है बच्चें होते हैं भगवान् के रूप,
    क्या इन के लिए तु भी है चुप।
    इन के लिए ना धुप, ना है छाव,
    इन के पैरों के नहीं दिखाते किसी को घाव।
    इन छोटे- छोटे आखों में देखते हैं बड़े- बड़े सपने ,
    कोई तो मिले जो कहे, इन्हें अपने।
    इन का क्या है कसूर, क्यों खा रहे हैं रास्ते की धूर।
    उस सुबह हुआ कुछ ऐसा अहसास,
    भगवान् के अस्तित्व से उठने लगा विश्वास।
    ऐ खुदा क्या तेरी यही है तेरी सीख,
    भगवान् के रूप से भगवान् स्वयं ही मगवाते भिख।

    -सौन्दर्या नीधी