Roushan

  • ओ शीत से आविष्ट निशा के घोर तिमिर,
    व्योम के पथ,
    इस शुक्ल पक्ष
    लौटा वह एक बार फिर !
    लेकिन, क्या कौतुक ?
    पीतवर्णी हिमाशिक्त रश्मियों के
    उतप्त होने का भ्रम,
    चतुर्दिश व्याप्त शीतलता में
    ठिठुरता, एकाक […]