Anirudh sethi

  • Ik chirag fr se Jala..
    Meri zaat ko raushan krne….
    Mjhe fr se wakti zndagi dene..
    Lkn mjhe..
    Dr lgta hai us Roshni SE..
    Chahti Hun Roshni ke saye se b dur rhna
    Dr lgta hai fr se mchlti ummid se..
    Chahti […]

  • ख़ुद पर यक़ीन नहीं रहा आज से।
    अब धोख़ा ही मिला इस अंदाज़ से।।
    @@@@RK@@@@

  • ।। सड़क का सरोकार ।।
    : अनुपम त्रिपाठी

    सड़कें : मीलों—की—परिधि—में बिछी होती हैं ।
    पगडंडियां : उसी परिधि के आसपास छुपी होती हैं ॥

    सड़कें : रफ्तार का प्रतीक हैं ।
    पगडंडियां : जीवन का गीत है ॥
    लोग ! स […]

    • umda!!

      • बहुत बहुत आभार पन्नाजी।यह कविता एक तुलनात्मक विश्लेषण है——-गांवों के प्रति गहन उदासीनता और शहरों के अंधाधुंध आधुनिकीकरण का। दोनों ही स्थितियां भयावह हैं।

    • nice one

      • धन्यवाद आदरणीय अनिरुद्ध जी।आपने रचना के मूल को समझा और सराहा इस हेतु आभार।सड़क और पगडंडी —–प्रतीक हैं; दो विशिष्ट जीवनशैली के।गांव ; भारत की रीढ़ हैं।

    • magnanimous 🙂

      • हार्दिक आभार अनुप्रियाजी।कविता की आत्मा ही हमारे राष्ट्रीय विकास की विसंगतिपूर्ण नीतियों पर कटाक्ष है। पता नहीं क्यों हम गाँवों के शहरीकरण को सच्चा विकास मानने की भूल कर बैठे हैं।समग्र विकास की अवधारणा में गाँवों की उपस्थिति अहम् है——-जरुरी तो ये है कि, गाँवों को जीवन की मूलभूत सुविधाओं से समृद्ध कर अपने खास अंदाज में जीने दिया जाये।कृषि आधारित अर्थव्यवस्था कभी वैश्विक उतार–चढा़व से ध्वस्त नहीं होती —— प्रभावित भले ही होती हो।गांव हमारी आत्मा हैं—–हम अपनी आत्मा को मारकर समृद्धि पा सकते हैं लेकिन , शांति कतई नहीं।