Akash Singh

  • बहुत कुछ कहते कहते रुक जाया करते हैं,
    बात ये है के हम इज्जत कर जाया करते हैं,

    रखते हैं अल्फ़ाज़ों का समन्दर अंदर अपने,
    और ख़ामोशी से दिल में उतर जाया करते हैं,

    प्रश्न ये बिल्कुल नहीं के उत्तर मिलता नहीं हम […]

  • मेरी आँखों में ही खुद को निहारा करता है,
    हर रोज़ ही वो चेहरा अपना संवारा करता है,

    आईने के सही मायने उसे समझ ही नहीं आते,
    कहता कुछ नहीं बस ज़हन में उतारा करता है,

    गुंजाइय दूर तलक कहीं सच है […]

  • बन्द मुट्ठी में हैं मगर कैद में नहीं आने वाली,
    हाथों की लकीरों की नर्मी नहीं जाने वाली,

    आलम सर्द है मेरे ज़हन का इस कदर क्या कहूँ,
    के ये बुढ़ापे की गर्मी है यूँही नहीं जाने वाली,

    जमाकर बैठा हूँ आज मैं भ […]

  • मैं तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ?
    मैं तड़पाती यादों की जागीरों का क्या करूँ?
    मैं अश्कों को पलकों में रोक सकता हूँ लेकिन-
    मैं दर्द की लिपटी हुई जंजीरों का क्या करूँ?

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • मैं तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ?
    मैं तड़पाती यादों की जागीरों का क्या करूँ?
    मैं अश्कों को पलकों में रोक सकता हूँ लेकिन-
    मैं दर्द की लिपटी हुई जंजीरों का क्या करूँ?

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • पत्थरों की नगरानी में शीशे के दिल रख दिए,
    इस नज़्म ऐ जवानी में ये किसने कदम रख दिए,

    मशहूर अँधेरे बाज़ार में जो मोल लग चुका था मेरा,
    इस ज़ख्म ऐ निशानी में ये किसने मरहम रख दिए,

    आहिस्ता-आहिस् […]

  • तरकीब कोई और ढूंढो ऐसे तो नज़र नहीं आने वाला,
    छुप कर बैठा है जो अंदर वो तो बाहर नहीं आने वाला,

    गहरा समन्दर है बहुत मन के भीतर हम सबके कोई,
    बिना डूबे तो देखो अब कोई तैर कर नहीं आने वाला,

    फांसला है मीलों […]

  • दिल के मेरे ताले की अजीज़ चाबी ले गया कोई,
    उम्र भर के लिए जैसे बेताबी दे गया कोई,

    शरारत कुछ ऐसी मुझसे छिप कर गया कोई,
    के अच्छे खासे दिल को खराबी दे गया कोई,

    महफूज़ रखे थे जो मन के दरवा […]

  • जितना भी देखा है मनो उतना ही कम देख है,
    मैंने इस दुनियाँ की आँखों में कितना कम देखा है,

    सड़कों पर पनपती इन बच्चों की कहानी से,
    किरदार जब भी देखा अपना मैंने विषम देखा है,

    बेबस रिहाई की उम्मीद में ज़िन्दगी […]

  •  

    आसमाँ छोड़ जब ज़मी पर उतरने लगती हैं फुलझड़ियाँ,
    हाथों में सबके सितारों सी चमकने लगती हैं फुलझड़ियाँ

    दामन अँधेरे का छोड़ कर एक दिन ऐसा भी आता है देखो,
    जब रौशनी में आकर खुद पर अकड़ने लगती हैं फुलझड़ियाँ, […]

  • हाथों की लकीरों की आवाज़ सुनानी होगी,
    अब दिल में छुपी जो हर बात बतानी होगी,

    खामोश रहने से कुछ मिलता नहीं सफ़र में,
    अब खुद से ही खुद को पुकार लगानी होगी,

    अंदाज़ यूँही तेरा समझ जाये वो महफ़िल ये नहीं,
    म […]

  • तुझे तराशकर फिर कुछ और मैं तराश न सका,
    तेरे चेहरे के सिवा आँखों में मैं कुछ उतार न सका,

    बड़ी मशक्कत लगी मुझको तुझको बनाने में मगर,
    तेरी रगों में मोहब्बत के रंग मैं उतार न सका।।
    राही (अंजाना)

  • तुझे तराशकर फिर कुछ और मैं तराश न सका,
    तेरे चेहरे के सिवा आँखों में मैं कुछ उतार न सका,

    बड़ी मशक्कत लगी मुझको तुझको बनाने में मगर,
    तेरी रगों में मोहब्बत के रंग मैं उतार न सका।।
    राही (अंजाना)

  • चाहे बिक जाएँ मेरी सारी कविताएं पर,
    मैं अपनी कलम नहीं बेचूंगा,

    चाहे लगा लो मुझपर कितने भी प्रतिबन्ध पर,
    मैं अपने बढ़ते हुए कदम नहीं रोकूँगा,

    बिक ते हैं तो बिक जाएँ तन किसी के भी,
    पर मैं अपनी सर ज़मी […]

  • मेरे दर्द को तेरा अफ़साना याद है।
    मेरे ज़ख्म को तेरा ठुकराना याद है।
    लबों को खींच लेती है पैमाने की तलब-
    हर शाम साक़ी को मेरा आना याद है।

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • ज़माने के आईने में चेहरे सभी अजीब दिखते हैं,
    सच से विलग मानों जैसे सभी बेतरतीब दिखते हैं,

    जब भी खुद को खुद ही में ढूंढना चाहते हैं हम,
    अपने ही चेहरे पर गढे कई चेहरे करीब दिखते हैं,

    ये कैसी ता […]

  • जिनके एक आवाहन पर सबने अपने हाथ उठाये थे,
    कदम-कदम पर अंग्रेजी शासन के छक्के साथ छुड़ाए थे,

    जिनके कहने पर अस्त्र वस्त्र सब मिलकर साथ जलाये थे,
    सत्य-अहिंसा के अचूक तब शस्त्र सशक्त उठाये थे,

    सच की ताक […]

  • साहिर तेरी आँखों का जो मुझपर चल गया,
    खोटा सिक्का था मैं मगर फिर भी चल गया,

    ज़ुबाँ होकर भी लोग कुछ कह न सके तुझसे,
    और मैं ख़ामोश होकर भी तेरे साथ चल गया।।

    समन्दर गहरा था बेशक मगर डुबो न सका,
    के तेरे […]

  • मोहब्बत के ख्वाब ने ये कैसा इत्तेफ़ाक कर दिया,

    दिल्लगी ने धड़कन को ही दिल के खिलाफ़ कर दिया,

    अच्छी ख़ासी तो चल रही थी ज़िन्दगी ‘राही’ अपनी,

    फिर क्या हुआ जो इस नशे ने तुम्हें ख़ाक कर दिया।।

    राही (अंजाना)

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