चंद शेर और मतले

चंद शेर और मतले

समेटता हूँ बिखरते ख्वाब को सजाता हूँ
रोज तकदीर को लिखता हूँ और मिटाता हूँ |
जो मद में चूर हो भूले है अपने ओहदे को
आईना देकर उन्हे उनकी जगह दिखाता हूँ ||
हवा हूँ मैं खुला ये आसमा वतन है मेरा
घरौदें फिर भी रोज रेत का बनाता हूँ |
मै आसमां का एक टूटा हुआ सितारा हूँ
वजूद कुछ भी नही है फिर भी जगमगाता हूँ ||
उपाध्याय…

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1 Comment

  1. Vedprakash singh - August 22, 2016, 1:51 pm

    बहुत खूब जी ।

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