तिरंगा

अपनी हथेली पर शहीदों के नाम की मेंहदी रचाता रहा हूँ मैं,
खुद ही के रंग में शहादत का रंग मिलाता रहा हूँ मैं,

हार कर सिमट जाते हैं जहाँ हौंसले सभी के,
वहीं हर मौसम में सरहद पर लहराता रहा हूँ मैं,

सो जाती है जहाँ रात भी किसी सैनिक को सुलाने में,
अक्सर उस सैनिक को हर पल जगाता रहा हूँ मैं,

दूर रहकर जो अपनों से चन्द स्वप्नों में मिलते हैं,
उन्हें दिन रात माँ के आँचल का एहसास कराता रहा हूँ मैं,

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई किसी एक जाति का नहीं मैं,
इस पूरे भारत का एक मात्र तिरंगा कहलाता रहा हूँ मैं।।

राही (अंजाना)

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6 Comments

  1. Mithilesh Rai - January 28, 2019, 8:33 am

    बेहतरीन

  2. ज्योति कुमार - February 2, 2019, 9:10 pm

    Waah sir

  3. ashmita - February 5, 2019, 11:27 pm

    Nice

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