कम देखा है

जितना भी देखा है मनो उतना ही कम देख है,
मैंने इस दुनियाँ की आँखों में कितना कम देखा है,

सड़कों पर पनपती इन बच्चों की कहानी से,
किरदार जब भी देखा अपना मैंने विषम देखा है,

बेबस रिहाई की उम्मीद में ज़िन्दगी को ढूंढते अक्सर,
लोगों की आँखों को होते हुए मैंने नम देखा है।।
राही (अंजाना)

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

2 Comments

  1. ज्योति कुमार - November 22, 2018, 8:09 am

    Waah

Leave a Reply