Ek budhi lachar wah

एक बूढ़ी थी लाचार वह,
थी भुख से बेचैन वह ,
बैठी थी सड़क किनारे वह,
लिए हाथों में कटोरा वह,
इस आस में कि पसीजे,
दिल किसी का और
देदे कटोरे में दो चार रु वह,
पर अचंभा तो देखो ,
कि हो ना सका ऐसा ,
लोग आते रहे,
लोग जाते रहे,
पलट कर किसी ने
देखा भी नहीं उसे ,
अजीब विडंबना है ईश्वर तेरी,
कहीं दी इतनी गरीबी तूने
तो कहीं दी जरूरत से ज्यादा अमीरी…….

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6 Comments

  1. राही अंजाना - April 12, 2019, 4:35 pm

    Wah

  2. ashmita - April 12, 2019, 5:02 pm

    Nice

  3. देवेश साखरे 'देव' - April 12, 2019, 6:06 pm

    सुन्दर रचना

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