इन हसरतों के बाजार में खून के रिश्ते भी टूट जाते हैं,
सियासत की तंग गलियों में कुछ अपने भी छूट जाते हैं।
अहंकार पाले बैठें हैं जो उनको कोई समझाये भी कैसे,
जो जरा सी बात पे ही अपने भाई से भी रूठ जाते हैं ।।

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

8 Comments

  1. Sridhar - April 11, 2017, 10:52 am

    behatreen janaab

  2. Neetika sarsar - April 21, 2017, 8:37 am

    Bhoot khoob sir

  3. Kumar Bunty - April 22, 2017, 1:24 am

    KYA KHOOB KAHI

  4. ravi pratap - April 26, 2017, 5:10 pm

    jang chij h asi lado to veer kahlawo na lado to kayer ….
    hasil kuch nahi hota jang se par sabak de jati h es jamane ko.

Leave a Reply