रुकते नहीं वो काफिले

रुकते नहीं वो काफिले
कितने चले कितने रुके ये न हम से पूछिए
चल पड़े जो बाँह थामें रुकते नहीं वो काफिले |

अक्षरों को जोड़ने में हिस्सा हमारा भी रहा
इस अधूरी पटकथा में किस्सा हमारा भी रहा
मानिए मत मानिए हम कह रहे
आदमी के बीच में घटते रहेंगे फासले |

लाख कोशिश कीजिए धर्म ध्वज को तोड़ने की
आस्था की अकारण गर्दनें मरोड़ने की
क्या कमी है गवाहों की यहाँ होते रहेंगे नामुरादी फैसले |

संहिताएँ वांचते थक गई हैं पीढ़ियाँ
ऊँची बहुत हैं न्याय पथ की सीढ़ियाँ
सौंप दीं जब फाइलें हैं मुन्सिफों को
उम्र भर लटके रहेंगे मामले |

घेरते हों अँधेरे औ’आँधियाँ
तूफ़ान भी साँप से फुँकारते
सिंधु के उफान भी डाल दी जब डोंगियाँ
जलधार में मानिए मत मानिए कम न होंगे हौसले |

@ डॉ. मनोहर अभय

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कवि और साहित्यकार

3 Comments

  1. Panna - January 13, 2016, 3:19 pm

    nice geet!

  2. Rohan Sharma - January 14, 2016, 12:14 pm

    nice one

  3. anupriya sharma - January 14, 2016, 5:14 pm

    beautiful geet 🙂

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