दौर आ चला है

देखो फिर किचड़ उछालने का दौर आ चला है।
खुद का दामन संभालने का दौर आ चला है।

लाख दाग सही, खुद का गिरेबां बेदाग नहीं,
दुसरों की गलतियां गिनाने का दौर आ चला है।

वादों की फेहरिस्त तो, फिर से लंबी हो चली,
इरादों को समझने समझाने का दौर आ चला है।

बरसों से निशां पे फ़ना हैं, कुछ एक नादां मुरीद,
शख्सियत पे बदलाव लाने का दौर आ चला है।

वहां रसूख़दारों की मिलीभगत, पूरे ज़ोरों पर है,
यहां दोस्तों के लड़ने लड़ाने का दौर आ चला है।

देवेश साखरे ‘देव’

1. फेहरिस्त-सूची, 2. मुरीद-अनुयायी

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4 Comments

  1. Poonam singh - March 25, 2019, 5:23 pm

    Nice gajal

  2. ashmita - March 27, 2019, 9:47 am

    Nice one

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