दौलत

कोई ज़मीं बेचता, कोई आसमां बेचता ।
दौलत के नशे में चूर, ये ज़हां बेचता ।

कब परवान चढ़ा, मोहब्बत मुफ्लिशी का,
दौलत मोहब्बत का है, आशीयां बेचता ।

दर-दर की ठोकरें, मुफ्लिशी के हालात,
दौलत की खातिर इंसां, अरमां बेचता ।

तारीख़ गवाह, कब दौलत किसका हुआ,
दौलत को ख़ुदा मान, अपना ख़ुदा बेचता ।

लूटे हैं कई घर, ये दौलतमंद मानूस,
दौलत की बदौलत, वो खुशियाँ बेचता ।

देवेश साखरे ‘देव’

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6 Comments

  1. ज्योति कुमार - February 2, 2019, 9:08 pm

    बिल्कुल सही जमाना के अनुसार

  2. Antariksha Saha - February 3, 2019, 6:36 pm

    Good one bro

  3. ashmita - February 5, 2019, 11:26 pm

    Nice

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