ग़ज़ल

 

तेरा — मेरा इश्क पुराना लगता है ।
दुश्मन हमको फिर भी जमाना लगता है ॥

गुलशन – गुलशन खुशबू तेरी साँसों की ।
मौसम भी तेरा ही दीवाना लगता है ॥

पर्वत – पर्वत तेरा यौवन बिखरा है ।
हद से गुजरना कितना सुहाना लगता है ॥

इन्द्र – धनुष का बनना – बिगड़ना तेवर तेरे ।
मस्त निगाहों का छलका पैमाना लगता है ॥

गुजरी हयात का मैं भी इक अफ़साना हूँ ।
सब कहते हैं ……. मर्ज़ पुराना लगता है ॥

सांझ — सिंदूरी सूरज का घर तज़ आई ।
चाँद निकलना एक बहाना लगता है ॥

‘अनुपम’ आसां दर्द का दरिया पीते जाना ।
उनको भुलाने में एक जमाना लगता है ॥
: अनुपम त्रिपाठी
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1 Comment

  1. देव कुमार - January 23, 2017, 11:35 am

    kya bat sir ji bahut khoob

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