‘ क्या यह सच नहीं !’

 

॥ “ यादों के जुगनू “ ॥

वह लड़की !
: न भूली होगी मुझे
: न भुलाई गई मुझसे

वह लड़की जानती है —-
ज़िस्म की ज़द — सम्बन्धों की हद
इसीलिए तो ;
इक ख़ुशबू की तरह फैली है : मेरे ज़ेहन मैं
और धूप की तरह ठिठकी रही : मन की मुंडेर पर
कुत्सित आकांक्षाएं —– कई बार जनमीं
मसल दी गईं — मन… ही… मन… में
“जु…..ग…..नू “ की त…..र…..ह

उसे पता है ——–
उसका ज़िस्म, दरिया की तरह उन्मुक्त है
और निरपेक्ष है : रूप ; जैसे बारिश की : धूप

वह लड़की !
यक़ीन नहीं करती
इस धारणा में
कि; चढ़े सफलता की सीढ़ी
बिस्तर की सिलवटें गिनते—सहेजते

उसे हैरत है !
कि; इतनी संज़ीदगी अब भी है, उसके पास
“चा …….ह ……त” न बन सकी : प्यास
फ़िर; क्यूँ बुन ली गई, अफ़वाहों की धुन्ध
अफ़सानों की गहरी सुरंग…..उसके ‘आस-पास’

मेरे और उसके दरमियाँ
महज़ एक विश्वास और सहजता के
कुछ नहीं………..’.कुछ..भी..नहीं ‘

मेरे लिए उसे छूना
अपने खिलाफ खड़ी परछाई को
आत्मसात करने जैसा ही दुरूह है

अभी—अभी : वही लड़की !
” यादों…….. में…….. उलझी ”
और बिखर गई : ‘ पारे—सी ‘

वह लड़की !
‘ य
की

न ‘
: न भूली होगी —– मुझे
: न भुलाई गई —–मुझसे
: अनुपम त्रिपाठी
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