मुक्तक

जुस्तज़ू क़ुरबत की फ़िर से बहक रही है।
तेरी बेरुख़ी से मगर उम्र थक रही है।
रात है ठहरी सी तेरे इंतज़ार में-
तिश्नगी आँखों में फ़िर से चहक रही है।

मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

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Lives in Varanasi, India

3 Comments

  1. Devesh Sakhare 'Dev' - January 11, 2019, 10:21 pm

    बहुत खूब

  2. Antariksha Saha - January 12, 2019, 8:44 pm

    Awesome

  3. राही अंजाना - January 15, 2019, 1:13 pm

    सर जी मस्त

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