Poetry on Picture Contest

फुटपाथ

सिकुड़कर फटि हुई कपड़ो मे गठरीनुमा होता जारहा है वह मायुस सा आँखो मे प्रचुर गम्भीरता लिए हुवे जैसे मजबूर मुक पशु हो पडा है फुटपाथ मे इसे देख अपने बदन के सुटको उतार फेकनेको जी चाहता है खामोस आँखो से वह बहुत कुछ कहरहा है, इस जमाने को टुकुर टुकुर हसरत भरी नजरो से देखता है कोइ राहगीर चबाये जो सेव को गटर मे फेके जुठा पत्तल जो चाटा उसने डैनिग टेबुल मे सजे पकवानोको देख उल्टी करनेको जी चाहता है क्यों एक इ... »

मेरा बचपन

मेरा बचपन

दोस्त बचपन के याद बहुत आते है जब बिछड़ जाते है कहां बयां हो पाते है जज्बात लफ़्जों में अधूरे ही रह जाते है मुकम्मल होने की हसरत में शरारतें, मस्ती जिनसे होती थी मुकम्मल जिंदगी छूट गयी सब बचपन के साथ याद बहुत आता है मुझे मेरा बचपन »

अपनी सारी जिंदगी बदल गयी

अपनी सारी जिंदगी बदल गयी

**************************************************** खेल खेलते थे तब भी हम आज भी खेलते है बस नियम बदल गये कुछ नीयत भी बदल गयी भागते रहते थे तब भी हम हर तरफ़, चारो तरफ़ आज भी भागते है मगर बस साथ बदल गया जगह बदल गयी वजह बदल गयी इक बचपन क्या बदला अपनी सारी जिंदगी बदल गयी! **************************************************** »

एक वो बचपन

 एक वो बचपन था अल्हड सा  आज तो सावन भी है पतछड सा  थक गए ढूँढ़ते अब तो पल वो प्यारे  खुला आसमान भी मिला पिंजरे सा कोई वज़ह नहीं थी कभी दौड़ने की  अब तो चलता भी हूँ दौड़ने सा  कहाँ छूट गए वो सुहाने दिन  था जीवन  फूलों की तरह महका सा                   राजेश ‘अरमान’ »

चंद यादें

वो दिन थे ये भी दिन हैं वो बचपन था ये जवाँ उम्र , ता उम्र रहेगी याद हमें वो बचपन की प्यारी यादें, नभ में बादल छा जाते ही हम बारिश की राह तका करते थे , सतरंगी इन्द्रधनुष को देख देख अतरंगी स्वप्न बुना करते थे , कागज की नावों में सवार हो भंवरों को पार किया करते थे , वो नाँव नहीं वो स्वप्न मेरे जो पानी पर तैरा करते थे , बचपन की सारी यादों को जवाँ उम्र जज्बातों को कागज की नाँव समेटे हैं वो वक्त कहाँ है... »

तेरी कश्ती मेरी कश्ती

तेरी कश्ती मेरी कश्ती

तेरी कश्ती मेरी कश्ती   बस इतनी सी तो रवानी है हर ज़िन्दगी की कहानी है सब कागज की कश्ती है और ख़ुद को पार लगानी है   दिखती सब अलग सी हैं असल में सब रब सी है एक सी ही तो रवानी है छोटी सी यह ज़िंदगानी है   एक सी सब बहतीं है थपेड़े सब तो सहती हैं अपनी अपनी बारी है जाने की सब तैयारी है   सबकी अपनी चाले हैं कौन किसी की माने है किसके हिस्से कितना पानी कोई ना यह कभी जाने है   है तो कश्ती को मालूम किनारों ... »

कागज की कश्ती

कागज की कश्ती

कागज की कश्ती जिसमें तैरता था बचपन कभी बहता था पानी की तेज धारों में बिना डरे, बिना रुके न डूबने का खोफ़ न पीछे रह जाने का डर जिंदगी गुजरती गयी बिना कुछ लिखे जिंदगी के कागज पर लिखा था जो कुछ घुल गयी उसकी स्याही वक्त के पानी में बहकर अब खाली खाली सी है जिंदगी बहने को तरसती है बिना रुक़े, बिना डरे »

बचपन की कागज़ की नाव

बचपन की कागज़ की नाव जो बारिश के पानी में तैरती थी जो कई बार तैरते तैरते थक जाती थी और उसे फिर से सीधा कर पानी में छोड़ देते थे और वो फिर तैरने लगती थी अब वो कागज़ की नाव बड़ी हो गई है और हम उसके आगे बहुत ही बौने अब भी कागज़ की नाव जब भी देखता हूँ लगता हम सचमुच उसके आगे बहुत है छोटे जो खुशिया वो अकेले हमें दे जाती थी आज हर ख़ुशी भी मिलकर , उस ख़ुशी के सामने बहुत छोटी है राजेश’अरमान’ »

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