Poetry on Picture Contest

कागज की कश्ती

कागज की कश्ती

कागज की कश्ती जिसमें तैरता था बचपन कभी बहता था पानी की तेज धारों में बिना डरे, बिना रुके न डूबने का खोफ़ न पीछे रह जाने का डर जिंदगी गुजरती गयी बिना कुछ लिखे जिंदगी के कागज पर लिखा था जो कुछ घुल गयी उसकी स्याही वक्त के पानी में बहकर अब खाली खाली सी है जिंदगी बहने को तरसती है बिना रुक़े, बिना डरे »

बचपन की कागज़ की नाव

बचपन की कागज़ की नाव जो बारिश के पानी में तैरती थी जो कई बार तैरते तैरते थक जाती थी और उसे फिर से सीधा कर पानी में छोड़ देते थे और वो फिर तैरने लगती थी अब वो कागज़ की नाव बड़ी हो गई है और हम उसके आगे बहुत ही बौने अब भी कागज़ की नाव जब भी देखता हूँ लगता हम सचमुच उसके आगे बहुत है छोटे जो खुशिया वो अकेले हमें दे जाती थी आज हर ख़ुशी भी मिलकर , उस ख़ुशी के सामने बहुत छोटी है राजेश’अरमान’ »

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