Poetry on Picture Contest

होली है रंगों का खेल

होली है रंगों का खेल होली है रंगों का खेल आवो खेले मिल के खेल देखो खेल रही है होली ये आसमा ये धरथी हमारी   आवो मिल के रंग चुराये सबको मिल के रंग लगाए रंग सच्चाई का आसमा से लाए रंग खुसी का हरयाली से चुराये रंग चेतना का सूर्य मे पाये रंग प्यार का फूलों से भर आए रंग सादगी का चाँद से ले आए आवो मिल रंग चुयारे सबको मिल के रंग लगाए मैं रंग जाऊँ तेरे रंग मैं तू मेरा रंग हो जाओ ओड़ तुझे मैं तन मन मे रंग दूँ... »

होली की टोली

होली पे मस्तों की देखो टोली चली, रँगने को एक दूजे की चोली चली, भुलाकर गमों के भँवर को भी देखो, आज गले से लगाने को दुनीयाँ चली, हरे लाल पिले गुलाबी और नीले, अबीर रंग खुशयों के उड़ाने चली, भरकर पिचकारी गुब्बारे पानी के, तन मन को सबके भिगाने ज़माने के, हर गली घर से देखो ये दुनियां चली॥ राही (अंजाना) »

आओ रंग लो लाल

आओ रंग ले एक दूसरे को, बस तन को नहीं मन को भी रंग ले…. हर भेदभाव जात-पात को रंग ले धर्म के नाम को रंग ले। मिला ले सबको एक रंग में वो रंग जो है मेरे तेरे प्यार का हर सरहद से पार का धरती से ले कर उस आकाश का रंग दो सबको उस रंग में।। सिर्फ अपना नही उस नन्ही परी का मुँह मीठा कराओ उस गरीब के घर तक भी रंग को पहुचाओ उस माँ के खाली दामन में भी ख़ुशी थोड़ी तुम डाल आओ।। सिर्फ अपनों को नहीं सबको रंग दो हर... »

आओ तन मन रंग लें

आओ तन मन रंग लें

चली बसंती हवाएँ , अल्हड़ फागुन संग, गुनगुनी धूप होने लगी अब गर्म, टेसू ,पलाश फूले, आम्र मंज्जरीयों से बाग हुए सजीले, तितली भौंरे कर रहे , फूलो के अब फेरे , चहुंँ दिशाओं में फैल रही, फागुन की तरूणाई, आओ तन मन रंग लें, हम मानवता के रंग , भेद-भाव सब भूल कर, आओ खेलें रंगों का ये खेल , प्रेम , सौहार्द के भावों से, हो जाए एक-दूजे का मेल, होली पर्व नहीं बस रंगो का खेल, प्रेम , सौहार्द के भावों का है ये म... »

सूखे नहीं थे धार आंशु के, पड़ गए खेतों मे फिर सूखे

सूखे नहीं थे धार आंशु के पड़ गए खेतों मे फिर सूखे  »

माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे

माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे दो घूँट पानी कब मिलेगा? बहाने मत बना दम निकला जा रहा है जल्दी बता पानी कब मिलेगा कैसे मैं अंकुरित कर दूं अन्न के दानो को कैसे मैं विश्वास कर लूँ कि पानी कल मिलेगा   वैसे  लगता तो नहीं कि अबकी बार मेरी माटी को जल मिलेगा लेकिन मैं भरोसा दिला रहा हूँ माटी को कि पानी जल्द ही मिलेगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि इस माटी की प्यास बुझाकर ही इस आस्मां को सकून का कोई पल मिलेगा       ... »

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बारिश का इंतज़ार

लगाकर टकटकी मैं किसी के इंतज़ार बैठा हूँ, भिगा देगी जो मुझ किसान की धरती मैं उसी के एहतराम में बैठा हूँ, बेसर्ब बंज़र सी पड़ी है मेरे खेतों की मिट्टी, मैं आँखों में हरियाले ख़्वाबों के मन्ज़र तमाम लिए बैठा हूँ॥ राही (अंजाना) »

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान, सूने-सूने किसानों के  अरमान, सूख गयी है डाली-डाली , खेतों में नहीं  हरियाली, खग-विहग या  हो माली, कर रहे घरों  को खाली, अन्नदाता किसान हमारा, खेत-खलियान है उसका सहारा, मूक खड़ा  ये  सोच रहा है, काश  आँखों में हो  इतना पानी, धरा को दे  देदूँ मैं हरियाली, अपलक आसमान निहार, बरखा की करे गुहार, आ जा काले बादल आ, बरखा रानी की पड़े फुहार, धरती मांँ का हो ऋंगार, हम मानव हैं बहुत नादा... »

ख़्वाबों की बंज़र ज़मी

देख लूँ एक बार इन आँखों से बारिश को, तो फिर इन आँखों से कोई काम नहीं लेना है, बंजर पडे मेरे ख़्वाबों की बस्ती भीग जाए एक बार, तो फिर इस बस्ती के सूखे हुए ख़्वाबों को कोई नाम नहीं देना है, चटकता सा खटकता है ये दामन माँ मेरी धरती, सम्भल कर के बहल जाए फसल जो रूप खिल जाए, तो फिर धरती के आँगन से कोई ईनाम नही लेना है॥ राही (अंजाना) »

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