Poetry on Picture Contest

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बारिश का इंतज़ार

लगाकर टकटकी मैं किसी के इंतज़ार बैठा हूँ, भिगा देगी जो मुझ किसान की धरती मैं उसी के एहतराम में बैठा हूँ, बेसर्ब बंज़र सी पड़ी है मेरे खेतों की मिट्टी, मैं आँखों में हरियाले ख़्वाबों के मन्ज़र तमाम लिए बैठा हूँ॥ राही (अंजाना) »

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान, सूने-सूने किसानों के  अरमान, सूख गयी है डाली-डाली , खेतों में नहीं  हरियाली, खग-विहग या  हो माली, कर रहे घरों  को खाली, अन्नदाता किसान हमारा, खेत-खलियान है उसका सहारा, मूक खड़ा  ये  सोच रहा है, काश  आँखों में हो  इतना पानी, धरा को दे  देदूँ मैं हरियाली, अपलक आसमान निहार, बरखा की करे गुहार, आ जा काले बादल आ, बरखा रानी की पड़े फुहार, धरती मांँ का हो ऋंगार, हम मानव हैं बहुत नादा... »

ख़्वाबों की बंज़र ज़मी

देख लूँ एक बार इन आँखों से बारिश को, तो फिर इन आँखों से कोई काम नहीं लेना है, बंजर पडे मेरे ख़्वाबों की बस्ती भीग जाए एक बार, तो फिर इस बस्ती के सूखे हुए ख़्वाबों को कोई नाम नहीं देना है, चटकता सा खटकता है ये दामन माँ मेरी धरती, सम्भल कर के बहल जाए फसल जो रूप खिल जाए, तो फिर धरती के आँगन से कोई ईनाम नही लेना है॥ राही (अंजाना) »

सूखी है जमीन

सूखी है जमीन, सूखा आसमान है मगर उम्मीद है कायम, जब तक जान है »

खोज…

खोजते है बचपन अपना , ढूंढते है नादानी अपनी , कूड़े के ढ़ेर को समझते है कहानी अपनी ! देखकर मुझको वैसे तो दया सब दिखाते है, पर जब कोई गलती हो जाए, तो पढ़े-लिखे बाबू भी गालियां दे जाते है ! कोड़े का ढ़ेर किसी को पैदा नहीं करता , साहब हम भी किसी की ओलाद है सिर्फ गरीबी के नहीं मारे हम, हम आप सबकी ख़ामोशी के भी शिकार है ! इसलिए कोड़े के ढ़ेर मे बचपन खोज रहे है, गलतफहमी है की कूड़ा बीन रहे है ! »

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के, दो रोटी के वास्ते, ईटे -पत्थर  तलाशते, तन उघरा मन  बिखरा है, बचपन  अपना   उजड़ा है, खेल-खिलौने हैं हमसे दूर, भोला-भाला  बचपन अपना, मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे, लगते बहुत लुभावने , पर बच्चे हम फूटपाथ के, ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते, मन हमारा मानव का है, पर पशुओं सा हम उसे पालते, कूड़ा-करकट के बीच, कोई मीठी गोली तलाशते, सर्दी-गर्मी और बरसात, करते हम पर... »

बचपन गरीब

यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से, पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से, रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में, वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे, बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से, पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥ राही (अंजाना) »

गरीबी का बिस्तर

गरीबी है कोई तो बिस्तर तलाश करो, रास्तों पर बचपन है कोई घर तलाश करो, कचरे में गुजर रही है ज़िन्दगी हमारी, कोई तो दो रोटी का ज़रिया तलाश करो, यूँ तो बहुत हैं इस ज़मी पर बाशिन्दे, मगर इस भीड़ में कोई अपनों का चेहरा तलाश करो, खड़े हैं पुतले भी ढ़के पूरे बदन को दुकानों में, जो ढ़क दे हमारे नंगे तन को वो कतरन तलाश करो॥ राही (अंजाना) »

गरीबी में जलते बदन

दे कर मिट्टी के खिलौने मेरे हाथ में मुझे बहकाओ न तुम, मैं शतरंज का खिलाड़ी हूँ सुनो, मुझे सांप सीढ़ी में उलझाओ न तुम, जानता हूँ बड़ा मुश्किल है यहाँ तेरे शहर में अपने पैर जमाना, मगर मैं भी ज़िद्दी “राही” हूँ मुझे न भटकाओ तुम, बेशक होंगे मजबूरियों पर टिके संबंधों के घर तुम्हारे, मगर मजबूत है रिश्तों पर पकड़ मेरी इसे छुड़ाओ न तुम, माना पत्थर दिल हैं लोग बड़े इस ज़माने में तोड़ना मुश्किल है, मगर म... »

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