Poetry on Picture Contest

खोज…

खोजते है बचपन अपना , ढूंढते है नादानी अपनी , कूड़े के ढ़ेर को समझते है कहानी अपनी ! देखकर मुझको वैसे तो दया सब दिखाते है, पर जब कोई गलती हो जाए, तो पढ़े-लिखे बाबू भी गालियां दे जाते है ! कोड़े का ढ़ेर किसी को पैदा नहीं करता , साहब हम भी किसी की ओलाद है सिर्फ गरीबी के नहीं मारे हम, हम आप सबकी ख़ामोशी के भी शिकार है ! इसलिए कोड़े के ढ़ेर मे बचपन खोज रहे है, गलतफहमी है की कूड़ा बीन रहे है ! »

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के, दो रोटी के वास्ते, ईटे -पत्थर  तलाशते, तन उघरा मन  बिखरा है, बचपन  अपना   उजड़ा है, खेल-खिलौने हैं हमसे दूर, भोला-भाला  बचपन अपना, मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे, लगते बहुत लुभावने , पर बच्चे हम फूटपाथ के, ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते, मन हमारा मानव का है, पर पशुओं सा हम उसे पालते, कूड़ा-करकट के बीच, कोई मीठी गोली तलाशते, सर्दी-गर्मी और बरसात, करते हम पर... »

बचपन गरीब

यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से, पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से, रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में, वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे, बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से, पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥ राही (अंजाना) »

गरीबी का बिस्तर

गरीबी है कोई तो बिस्तर तलाश करो, रास्तों पर बचपन है कोई घर तलाश करो, कचरे में गुजर रही है ज़िन्दगी हमारी, कोई तो दो रोटी का ज़रिया तलाश करो, यूँ तो बहुत हैं इस ज़मी पर बाशिन्दे, मगर इस भीड़ में कोई अपनों का चेहरा तलाश करो, खड़े हैं पुतले भी ढ़के पूरे बदन को दुकानों में, जो ढ़क दे हमारे नंगे तन को वो कतरन तलाश करो॥ राही (अंजाना) »

गरीबी में जलते बदन

दे कर मिट्टी के खिलौने मेरे हाथ में मुझे बहकाओ न तुम, मैं शतरंज का खिलाड़ी हूँ सुनो, मुझे सांप सीढ़ी में उलझाओ न तुम, जानता हूँ बड़ा मुश्किल है यहाँ तेरे शहर में अपने पैर जमाना, मगर मैं भी ज़िद्दी “राही” हूँ मुझे न भटकाओ तुम, बेशक होंगे मजबूरियों पर टिके संबंधों के घर तुम्हारे, मगर मजबूत है रिश्तों पर पकड़ मेरी इसे छुड़ाओ न तुम, माना पत्थर दिल हैं लोग बड़े इस ज़माने में तोड़ना मुश्किल है, मगर म... »

चाय का बहाना

आओ बैठो संग मेरे एक एक कप चाय हो जाए, फिर से बीते लम्हों की चर्चा खुले आम हो जाए, कह दूँ मैं भी अपने दिल की, कहदो तुम भी अपने दिल की, और फिर तेरे मेरे दिल का रिश्ता सरेआम हो जाए, वैसे तो हर रात होती रहती है ख़्वाबों में मुलाक़ात तुझसे, चल आज चाय की चुस्की के बहाने नज़ारा कुछ ख़ास हो जाए॥ राही (अंजाना) »

आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये|

आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये|

आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये दिल के राज जो छुपे बैठे है अरसे से उनसे कुछ गुफ़्तगू हो जाये इससे पहले उम्र ए दराज धोखा दे ले ले कुछ लफ्जों का सहारा कहीं लाठी का सहारा ना हो जाये आज कुछ चाय पे चर्चा हो जाये| »

कितने ही दिन गुज़रे हैं पर, ना गुजरी वो शाम अभी तक; तुम तो चले गए पर मैं हूँ, खुद में ही गुमनाम अभी तक! . तुम्ही आदि हो,…तुम्ही अन्त हो,…तुमसे ही मैं हूँ, जो हूँ; ये छोटी सी बात तुम्हें हूँ, समझाने में नाकाम अभी तक! . कैसे कह दूँ, …तुम ना भटको, …मैं भी तो इक आवारा हूँ; शाम ढले मैं घर न पहुँचा, है मुझपे ये इल्ज़ाम अभी तक! . प्यार से, ‘पागल’ नाम दिया था, तूने जो इक रोज़ मुझे; तु... »

चुस्की चाय की

वही चाय के दो कप और एक प्लेट लौटा दे, कोई तो तेरे साथ बीते पलों को वापस लौटा दे, एक चाय के कप का बना कर झूठा बहाना, वो तेरा रोज रोज मेरे घर चले आना लौटा दे, तेरे साथ बैठ कर वो नज़रें मिलाना, वो चाय की चुस्की वो वक्त पुराना लौटा दे॥ राही (अंजाना) »

महफ़िल-ए-चाय

मैं मान लेती हूँ, की तुम्हे मेरी याद नहीं आती , पर वो महफ़िल-ए-चाय तो याद आती होगी ! वो शाम की रवानगी , वो हवा की दिवानगी, वो फूलो की मस्तांगी , याद न आती हो , पर वो चाय की चुस्की की आवाज तो याद आती होगी ! याद ना आती हो तुमको गूफ्तगू-ए-महफिल , पर निगाहों की शरारते तो याद आती होगी ! मैं मान लेती हूँ , की तुम्हे मेरी याद नहीं आती , पर वो महफिल-ए-चाय तो याद आती होगी ! हर शाम चाय के साथ अखबार पढ़ना , आद... »

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