Poetry on Picture Contest

चुनावों के इस मौसम में

चुनावों के इस मौसम में फिजा में कई रंग बिखरेंगे अगर कर सके हम अपने मत का सही प्रयोग हम नये युग में नयी रोशनी सा निखरेंगे »

वोट डालने चलो सखी री

वोट डालने चलो सखी री

वोट डालने चलो सखी री लोकतंत्र के अब आयी बारी एक वोट से करते हैं बदलाव नेताजी के बदले हम हाव-भाव ! सही उम्मीदवार का करते है हम चुनाव, बेईमानों को नहीं देंगे अब भाव ! आपका वोट है आपकी ताकत लोकतंत्र की है ये लागत सुबह सवेरे वोट दे आओ वोटर ID संग ले जाओ ! »

जागरूक मतदाता

सोंच समझकर वोट दें तो बन जायेगी तकदीर, चलो निकाले सोच समझ कर ऐसी कोई तदबीर, विश्व पटल पर छप जाये अपने देश की तस्वीर, जागरूक करे जो हर जन को हो ऐसी कोई तरकीब, लोकतन्त्र समझे नहीं और बहाते जो झूठे नीर, जनता के मतदान से ही जो बन जाते बलवीर, हर मतदाता का मान करे जो सरकार चलाये वीर, चलो लगादे हिम्मत कर अब कोई ऐसी तरतीब।। राही अंजाना »

माँ

माँ

देखा किसी ने नहीं है मगर बहुत बड़ा बताते हैं लोग, कुछ लोग उसे ईश्वर तो कुछ उसे खुदा बताते हैं लोग, पता किसी के पास नहीं है मगर रस्ता सभी बताते हैं लोग, कुछ लोग उसे मन्दिर तो कुछ उसे मस्ज़िद बताते हैं लोग, ढूढ़ते फिरते हैं जिसे हम यहां वहां भटकते दर बदर, तो कुछ ऐसे भी हैं जो उसे तेरी मेरी माँ बताते हैं लोग।। राही (अंजाना) (Winner of ‘Poetry on Picture’ contest) »

धुँआ

पूरे शहर को इस काले धुंए की आग़ोश में जाना पड़ा, क्यों इस ज़मी की छाती पर फैक्ट्रियों को लगाना पड़ा, चन्द सपनों को अपने सजाने की इस चाहत में भला, क्यों उस आसमाँ की आँखों को भी यूँ रुलाना पड़ा, अमीरों की अमीरी के इन बड़े कारखानों में घुसकर, क्यों हम छोटे गरीबों के जिस्मों को ही यूँ हर्जाना पड़ा॥ राही (अंजाना) »

हवा में घुल रहा आज जहर है

हवा में घुल रहा आज जहर है सांसो को आज तरस रहा आज शहर है बंद कमरे में कब तक कैद रहोगे खुले आम घूम रहा आज कहर है »

सर्दी नहीं जाने वाली

सर्दी नहीं जाने वाली

बन्द मुट्ठी में हैं मगर कैद में नहीं आने वाली, हाथों की लकीरों की नर्मी नहीं जाने वाली, आलम सर्द है मेरे ज़हन का इस कदर क्या कहूँ, के ये बुढ़ापे की गर्मी है यूँही नहीं जाने वाली, जमाकर बैठा हूँ आज मैं भी चौकड़ी यारों के साथ, अब अकेले रहने से तो ये सर्दी नहीं जाने वाली।। राही (अंजाना) »

फुलझड़ियाँ

फुलझड़ियाँ

  आसमाँ छोड़ जब ज़मी पर उतरने लगती हैं फुलझड़ियाँ, हाथों में सबके सितारों सी चमकने लगती हैं फुलझड़ियाँ दामन अँधेरे का छोड़ कर एक दिन ऐसा भी आता है देखो, जब रौशनी में आकर खुद पर अकड़ने लगती हैं फुलझड़ियाँ, अमीरी गरीबी के इस भरम को मिटाने हर दीवाली पर, दुनियाँ के हर कोने में बिजली सी कड़कने लगती हैं फुलझड़ियाँ।। – राही (अंजाना) »

दहेज

दहेज

मेरे माथे को सिंदूर देके मेरे विचारों को समेट दिया मेरे गले को हार से सजाया पर मेरी आवाज़ को बांध दिया मेरे हाथों मे चूड़ियों का बोझ डालके उन्हें भी अपना दास बना दिया मैं फिर भी खुश थी मुझे अपाहिज किया पर थाम लिया मेरे पैैरों में पायल पहनाई और मेरे कदमों को थमा दिया मैं फिर भी खुश थी कि मेरा संसार एक कमरे में ला दिया पर आज मुझे मेरा और मैं शब्द नहीं मिल रहे शायद वो भी दहेज में चले गये… »

चील कौवो सा नोचता ये संसार

चील और कौवो सा नोचता रहता संसार है, ये कैसा चोरों का फैला व्यापार है, दहेज के नाम पर बिक रही हैं नारियाँ कैसे, ये कैसा नारियों को गिरा कर झुका देने वाला हथियार है, न चाह कर भी बिक जाती है जहाँ अपनी ही हस्ती, ये मोल भाव का जबरन फैला कैसा बाज़ार है॥ राही (अंजाना) »

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