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जब–जब देखा ।

मैने उसको, जब-जब देखा । सजते देखा, धजते देखा, संभलते देखा !! मैने उसको, गलियो मे सदियो से किसी का इंतजार करते देखा। मैने उसको जब– जब देखा हाथो मे पत्थर देखा।। ये जमीन तुने छीन लिया मेरे जमीं को बस चिल्लाते देखा।। जब– जब देखा ज्योति मो-न०9123155481 »

हुअा वहुत अत्याचार

हुआ बहुत अत्याचार —– अब हर घर से भगत सिह , सुखदेव निकलना चाहिए। रोज जो चेहरे बदलते है,लिबाजो कि तरह अब उसको फाँसी पर चढ़ाना चाहिए।। भगत, सुखदेव तुझ पर बहुत हुए अत्याचार, अब उस गद्देदार को खुले आसमान मे सिर–धर से अलग कर देना चाहिए, मेरे मालिक,मेरे देश पर बहुत हो रहे अत्याचार। अब हर घर से भगत,सुखदेव निकलाना चाहिए।। ज्योति मो न०9123155481 »

मुक्तक

मैं कैसे कह दूँ तुमसे प्यार नहीं रहा! तेरी गुफ्तगूं का इंतजार नहीं रहा! हर वक्त खिंचती हैं जब तेरी अदाऐं, मैं कैसे कह दूँ दिल बेकरार नहीं रहा! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

कुछ टाइम निकालकर याद कर लेना मुझे भी।

कुछ टाइम निकालकर याद कर लेना मुझे भी।

कुछ टाइम निकालकर याद कर लेना मुझे भी। पिछले कल तक साथ रहा तेरा हमारा। आज के ही दिन डोली सजी थी, और माँग मे सितारा। चाँद की रोशनी सभी को रास आते है, पर दिये की रोशनी पर हक हमारा ।। मुबारक हो चाँद की रोशनी तुझे भी। हो सके तो याद कर लेना उस रात मुझे भी।। भले दुध के ग्लास मे हक नही हमारा, पर दिया गया तुम्हारा तोफा दिये की ऱोशनी पर हक हमारा तुम्हारा। समाने खड़ी है तुम्हारे मंजिल की गाड़ी , क्यो मुझको इ... »

मुक्तक

तुम जो मुस्कुराती हो नजरें बदलकर! नीयत पिघल जाती है मेरी मचलकर! चाहत धधक जाती है जैसे जिगर में, हर बार जुस्तजू की आहों में ढलकर! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

मुक्तक

मैं कबतलक तेरा इंतजार करता रहूँ? मैं कबतलक तुम पर ऐतबार करता रहूँ? मुझे खौफ सताता है तेरी बेरुखी का, मैं कबतलक खुद को बेकरार करता रहूँ? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

मुक्तक

मैं कबतलक तेरा इंतजार करता रहूँ? मैं कबतलक तुम पर ऐतबार करता रहूँ? मुझे खौफ सताता है तेरी बेरुखी का, मैं कबतलक खुद को बेकरार करता रहूँ? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

एक उम्मीद फिर से छुट गई।

एक उम्मीद फिर हाथ से छुट गयी, देखते ही देखते एक और रिस्ता टुट गई। इस तरह तोड़ा है— मतलबी दुनिया मेरा दिल । अब जिन्दगी भी हमसे ऱूठ गयी।। »

कितना भी ज़िद्दी बन जाऊँ

कितना भी ज़िद्दी बन जाऊँ, माँ थोड़ा भी न गुस्सा होती है, एक निवाला अपने हिस्से का खिलाकर माँ फिर चैन से सोती है।। -मनीष »

मुक्तक

हम जिंदगी में गम को कबतक सहेंगे? हम राह में काँटों पर कबतक चलेंगे? कदम तमन्नाओं के रुकते नहीं मगर, हम मुश्किले-सफ़र में कबतक रहेंगे? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

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