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मैं बेटी हूँ

मैं बेटी हूँ….. मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ। खामोश सदा मैं रहती हूँ। मैं बेटी हूँ….. मैं धरती माँ की बेटी हूँ। निःश्वास साँस मैं ढोती हूँ। मैं बेटी हूँ…….. मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ। खामोश सदा मैं रहती हूँ। मैं बेटी हूँ….. मैं धरती माँ की बेटी हूँ। निःश्वास साँस मैं ढोती हूँ। मैं बेटी हूँ……. »

Ek Vichar

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तिब्बत, चीन के बाप का नहीं

तिब्बत, चीन के बाप का नहीं

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हैरानी सारी हमें ही होनी थी – बृजमोहन स्वामी की घातक कविता।

हैरानी कुछ यूँ हुई कि उन्होंने हमें सर खुजाने का वक़्त भी नही दिया, जबकि वक़्त उनकी मुट्ठियों में भी नही देखा गया, लब पर जलती हुई सारी बात हमने फूँक दी सिवाय इस सिद्धांत के कि हमने सपनों की तरह आदमी देखे, जबकि ‘सपने’ किसी गर्भाशय में पल रहे होते तो सारे अल्ट्रासाउंड घड़ियों की तरह बिकते और हम वक़्त देखने के लिए सर फोड़ते, मेहँदी की तरह लांछन लगाते, सिगरेटों की तरह घर फूंकते, कुत्तों की तरह ... »

ओम पुरी जिन्दा है – बृजमोहन स्वामी

चलाओ टीवी, भिन्डी काटती हुई अंगुली का पसीना न पोंछते हुए प्रेमिका को मिलाओ फोन, बांटों दुःख ओम पुरी चले गए, सुनाओ निःशब्द रो लो तीन सौ आँसू लिखो डायरी में, बदलो तस्वीरें और बताओ खुद को इतना खरा आदमी था कि मौत में बीमारी या दर्द की मिलावट नहीं की ऐसे आदमी को कैसे याद किया जा सकता है, शायद उनकी पिछले सालों की बुरी फिल्में देख कर? काटो तो खून, न काटो तो वक़्त इंसान बस उतना ही होता, जितना वह छोड़कर जात... »

कविता:- सफर

जीवन के इस सफ़र में प्रकृति ही है जीवन हमारा, बढ़ती हुई आबादी में किंतु हर मनुष्य फिर रहा मारा-मारा॥ मनुष्य इसको नष्ट कर रहा है जिंदगी अपनी भ्रष्ट कर रहा है, करके नशा देता भाषण क्या नहीं जानता नशा नाश का कारण॥ मान प्रतिष्ठा या चाहे हो शोहरत है निर्भर सब धन दौलत पर, मान प्रतिष्ठा चाहे हो शोहरत है निर्भर सब धन दौलत पर, बनकर ब्रहमचारी सामने इस जग के निगाहें रखता हर औरत पर॥ हर प्राणी ईश्वर की रचना फिर... »

आँखों से बहता पानी…

आँखों से बहता पानी…

आँखों से बहता पानी कहाँ एक सा होता है कभी खुद के लिए रोता है, कभी खुदा के लिए रोता है ! कभी कुछ पा के रोता है , कभी कुछ खो के रोता है ! कभी किसी की यादो मे रोता है , कभी किसी को याद करके रोता है ! कभी खतों मे रोता है , कभी ख़ता करके रोता है ! कभी आँखो से पानी टपकाकर रोता है , कभी दिल मे छुपकर रोता है ! रोता है जब भी दर्द का अहसास कराकर रोता है ! »

तेरे दुःख मेरा कर्ज

तेरे दुःख मेरा कर्ज

मेरे जीवन का किसान बनकर, तूने सफलता के बीज़ बोए | अपने सपने बेचकर तूने, मेरे मामूली ख़्वाब संजोए | अक्षर का शुरूआती ज्ञान￰￰ देकर मुझे अपना शिष्य बनाया | अपना पेट काट -काट कर , तूने मेरा भविष्य सजाया | अंको का लालच बहुत था मुझे , रात – रात जागना होता था | तेरी नींद अचानक खुलती , न चाहते हुए भी सोता था | एक तेरा साथ रहा , तभी तो मेरा आज है | पूरा श्रेय मुझे दे दिया , कहा , “तू ही तो मेरा... »

आज फिर …

कुछ लिख कर आज फिर मिटा दिया, कुछ बना कर आज फिर बिगाड़ दिया, वो आज भी नहीं आएगा मालूम है हमे, पर फिर भी उसके आने के इन्तजार मे खुद को फिर सँवार लिया ! »

मुक्तक

जो यही सजा है मेरे गुनाह की तो यही सही , लेकिन सुनवाई का एक मौका तो दे ! (निसार) »

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