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दर–दर ठोकर खाया हूँ।

दर–दर ठोकर खाया हूँ, जीवन से भी मै हारा हूँ। दे–दे सहारा —- तेरे पास मै आया हूँ।। नही मंजिल मिली नही किनारा,मुझे दे–दे सहारा, मेरा कोई नही ठिकाना है! मै हूँ बेसहारा– मुझे दे– दे सहारा कुछ भी इंसान हूँ, दुनिया ने शिर्फ दी रूसवाई है, तेरे दर पर सुना होती सुनवाई है। एहसान करो मुझ पर मै दर दर ठोकर खा़या हूँ, तेरी ये मतलबी दुनिया मुझे हराया है, दर–दर ठोकर दिलवा... »

मुक्तक

तेरी याद है दिल में दर्दे–तन्हाई सी! ख्वाहिशों की शक्ल में तैरती परछाई सी! चाहत हर पल गूँजती है मेरे सीने में, तेरी तमन्नाओं की जैसे शहनाई सी! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

जबसे दारू बंद भेलैय विहार मे।

पटना, छपरा दरभंगा तक सुख गया दाऱू का प्याला, हाजीपुर के पुल पर केले अब बेच रही मधुशाला। महफिल भी रूठ ग़यी , और नाच खत्म नागिन वाला। शांत– शांत अब लगे बराती—– जैसे लग रहा मर गया पड़ोसी वाली।। कैसे पिये दौ सौ का पव्वा मिलता चालीस वाला, बेगुसराय मे बस पकड़ कर बाहर को जाता पीने वाला। अब झारखंड ,युपी मे बुझती दिल की ज्वाला। ज्योति मो न० 9123155481 »

सुन ले पाकिस्तान।।

सुन ले पाकिस्तान, कश्मीर का ख्याल भी दिल मे मत लना। वरना जो भी दिये है,वो भी छीन लेगे पाकिस्तान।। अबकी बार कोई गलती मत करना कश्मीर पर वरना छीन लेगे—— १ अलतीत फोर्ट २ सादिक गढ़ पैलेस ३ रोहतास फोर्टे ४ नुर महल ५ राँयल फोर्ट ६ मुजफराबाद फोर्ट ७ रानी कोर्ट किला ८ वाला हिंसार फोर्ट ठान लिया है,हम सब हिन्दुस्तानी अब मिटा देगे तेरी पहचान। सुन ले बेटा पाकिस्तान।। तुम एक बार भी मेरे काश्मीर (जन... »

कैद

परिन्दे कैद से छुटा नही, दुश्मन जाल विछाना शुरू किया। ज्योति »

कैद

परिन्दे कैद से छुटा नही, दुश्मन जाल विछाना शुरू किया। ज्योति »

आज की नारी पड़ गयी भारी।

आज की नारी पड़ गयी भारी, कोई ना पार पाए ऐसी करती होशियारी। जीवन इसका WhatsApp पर व्यस्त रहता , चल जाए भाड़ मे दुनिया सारी। आज की नारी– फैशन की बात इससे ना पुछो वरना दिख वा देगी दुनिया सारी– और बेचवा देगी जमीन सारी आज की नारी। साँस — ससुर की सेवा की ना छेड़ो वरना किचन मे टुट जाएगी बर्तन सारी। भुल कर भी इसके मायके वाले के कुछ ना कहना वरना घर मे हो जाएगी महाभारत भाड़ी। आज की नारी पड... »

मुक्तक

तेरी याद मुझसे भुलायी न गयी! तेरी याद दिल से मिटायी न गयी! चाहत जल रही है सीने में मगर, आग़ तिश्नगी की बुझायी न गयी! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

यहीं पर सब कुछ छोड़कर जाना है।

छोड़कर सब कुछ यहीं पर एक दिन जाना है, लगा एक अजीब सा सदमा। आज तक जो किया कुछ ना हो सका अपना।। अगर यही हकीकत है,तो क्यो खुनी रात खेलते है,हम। तो क्यो खेत की आड़ी के लिए लर जाते है,हम— तो क्यो आँगन मे दिवार पर जाते है-क्यो।। जो भाई साथ मे खाना खाते क्यो पराये बन जाते है, माँ अजनबी बन जाती है, पत्नी आँख के तारे बन जाती है -क्यो।।। »

मुक्तक

आओ करीब तुम नूरानी रात हुई है! चाहत की फिर से दीवानी रात हुई है! तोड़कर जमाने की जंजीर-ए-रस्म को, आओ करीब तुम मस्तानी रात हुई है! मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

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