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मौला….

मौला अपनी तू रहो मे, बैठे रहने दे छाओ मे एक दिन तो होगा कर्म ये भ्रम तो रहने दे ! चाहे सपनो को सपने रहने दे, लकिन अपने तो रहने दे शिकवे, शिकायत क्या करने है पर कुछ तो हक से कहने दे! »

खुदा से

जब दिल रोए पर अश्क ना हो , जब नफरत हो पर रश्क ना हो , जब सजदा हो पर दुआ ना हो , जब किस्सा हो पर बया ना हो , जब जिन्दा हो पर अहसास ना हो , तब कह दे ना खुदा से अब तू मेरे साथ और बदनाम ना हो ! ‘निसार’ »

खोया बचपन

खोया बचपन

बचपन के  शहर मे जाने , क्यों  ख़ाली से मकान पड़े है सयानेपन के हर जगह पर ऊँचे-ऊँचे बंगले खड़े है कुछ आधुनिकता की आड़ मे लूट गए कुछ को मजबूरियों न लूटा है महँगे खिलौनो की सौदेबाजी मे, बचपन को जाने किसने लूटा है! कहाँ गए जाने जो कागज की कश्ती बनाया करते थे, नन्हे-नन्हे हाथो से मिटटी के घर बनाया करते थे जो पत्थर के टुकड़ो से भी खेल बनाया करते थे ! कोई तो  उनको ढूंढ के ला दो , कोई तो  उनको खोजकर ला दो , मा... »

फूलों की खेती

चन्द्र मोहन किस्कु फूलों की खेती ********** दुनिया में अब बढ़ गया है हिंसा लोग मिलते ही लड़ते है झगड़ते है और हत्या के लिए हथियार हाथ में लेते है दुनिया में अब बढ़ रहा है बोम और हथियारों की संख्या बढ़ रहे है फैाज इसलिए तो फूलों पर कविता लिख रहा हूँ बोना शुरू किया है फूलों की बीज हँसी, हर्ष की स्वप्न, शान्ति की एक दिन बो दूँगा पुरे दुनिया में फूल ही फूल रंग -बिरंगे सुन्दर फूल हँसीवाले स्वप्न और गानेवाल... »

समझाऊँगी क्या मैं तुझको बतलाऊँगी क्या मैं तुझको ! कभी तो अपना जान तू मुझको कभी तो अपना मान तू मुझको ! बस इतना-सा वादा कर दे बस इतना-सा सच्चा कर दे ! मुझको तू अपने काबिल कर दे मुझको तू इतना कामिल कर दे ! »

क्यों मिली नहीं रहमत तेरी अब तक क्या मेरी कोई भूल तेरे दर मे गुनाह मुक़र्र हुई है ! »

क्यों खुदा तेरा दिल भी बंजर-सा हुआ क्या तेरा भी कोई अपना बेईमान-सा हुआ ! »

मेरी डायरी

साथी मेरी न्यारी है मुझको सबसे प्यारी है राज ये मेरे रखती है किसी को नहीं दस्ती है हर वो बात ये सुनती है जो दुनिया को चुभती है दोस्ती ये ऐसी सच्ची है जो सबसे पक्की है ! »

चार दिन की थी जिंदगी एक दिन का था बचपन उसमे थोड़ा-सा कच्चा था, थोड़ा-सा अच्छा था लेकिन वो ही सबसे सच्चा था , क्योंकि जिन्दा था बैखोफ मैं उसमे चाहे रोता था माँ की गोद मे छुपके! दूसरे दिन की थी जवानी जिम्मेदारी ना थी कोई उसमे बस मस्ती की कंधो पर गठरी थी सारा दिन घूमता था यहाँ-वहाँ किसी मंजिल पर जाने की कहा मुझको जल्दी थी ! तीसरे दिन, मै ना जवान था ना बूढ़ा था बस ज़िम्मेदारियों का पुतला था हर कदम सोच-समझ... »

जाने कहां वो

जाने  कहां वो, सिलसिले  रह गये, कोई शिकवे ना गिले रह गये, अब जिंदगी पहुंच गई उस मुकाम पर, जहां तुम  तुम  ना रह गये, और हम  हम  ना रह गये। और हम हम ना रह गये। »

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