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शीर्षक – यादों का पिटारा….!!

शीर्षक – यादों का पिटारा….!!

लम्हे बचें जो जिंदगी के वो खुल के काट लें, जो बाकी रह जाए पिटारे में उसे आपस में बांट लें, वो नीले समंदर के किनारे, पिघले मोती से अंगारे, चल ख्वाहिशों की मुट्ठी में बांध लें, वो रंगीन लम्हे जिंदादिल के सारे, खुशी की चादर ओढ़े पलकों की बाहों में थाम ले, धूप छांव के खेल निराले, कुछ अपनी किस्मत के छाले, अपनी प्रेम की वर्षा कर जिंदगी को जिंदगी का नाम दें, लम्हे बचें जो जिंदगी के वो खुल के काट लें, जो ... »

एक शहर….!!

एक शहर….!!

रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया, जिससे उढते धुएँ में इंसानियत का रिसता खुन नज़र आया, हँसते हुए चेहराे में, खुद को झूठा साबित करता हर इंसान जाे पाया, तब कहीं जाकर हमें भी कलयुग की रामलीला का सार समझ आया, रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया….!! कुछ आेर आगे बडे, ताे खंडर हुईं ईमारताें का मलबा था, कहीं दुआ दबी थी , कहीं काेई शिकायत, कहीं ममता बिखरी पड़ी थी, ताे कहीं साेने की ईंटों के नीच... »

खामोशिया

मेरी खामोशिया खामोश नहीं है जरा इक बार सुन कर तो देखो| »

मानुषी छिल्लर

मानुषी छिल्लर

फ़क्र है हमें, नाज है हरियाणा की बेटी तू भारत की शान है| »

मैं बेटी हूँ

मैं बेटी हूँ….. मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ। खामोश सदा मैं रहती हूँ। मैं बेटी हूँ….. मैं धरती माँ की बेटी हूँ। निःश्वास साँस मैं ढोती हूँ। मैं बेटी हूँ…….. मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ। खामोश सदा मैं रहती हूँ। मैं बेटी हूँ….. मैं धरती माँ की बेटी हूँ। निःश्वास साँस मैं ढोती हूँ। मैं बेटी हूँ……. »

Ek Vichar

Ek Vichar

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तिब्बत, चीन के बाप का नहीं

तिब्बत, चीन के बाप का नहीं

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हैरानी सारी हमें ही होनी थी – बृजमोहन स्वामी की घातक कविता।

हैरानी कुछ यूँ हुई कि उन्होंने हमें सर खुजाने का वक़्त भी नही दिया, जबकि वक़्त उनकी मुट्ठियों में भी नही देखा गया, लब पर जलती हुई सारी बात हमने फूँक दी सिवाय इस सिद्धांत के कि हमने सपनों की तरह आदमी देखे, जबकि ‘सपने’ किसी गर्भाशय में पल रहे होते तो सारे अल्ट्रासाउंड घड़ियों की तरह बिकते और हम वक़्त देखने के लिए सर फोड़ते, मेहँदी की तरह लांछन लगाते, सिगरेटों की तरह घर फूंकते, कुत्तों की तरह ... »

ओम पुरी जिन्दा है – बृजमोहन स्वामी

चलाओ टीवी, भिन्डी काटती हुई अंगुली का पसीना न पोंछते हुए प्रेमिका को मिलाओ फोन, बांटों दुःख ओम पुरी चले गए, सुनाओ निःशब्द रो लो तीन सौ आँसू लिखो डायरी में, बदलो तस्वीरें और बताओ खुद को इतना खरा आदमी था कि मौत में बीमारी या दर्द की मिलावट नहीं की ऐसे आदमी को कैसे याद किया जा सकता है, शायद उनकी पिछले सालों की बुरी फिल्में देख कर? काटो तो खून, न काटो तो वक़्त इंसान बस उतना ही होता, जितना वह छोड़कर जात... »

कविता:- सफर

जीवन के इस सफ़र में प्रकृति ही है जीवन हमारा, बढ़ती हुई आबादी में किंतु हर मनुष्य फिर रहा मारा-मारा॥ मनुष्य इसको नष्ट कर रहा है जिंदगी अपनी भ्रष्ट कर रहा है, करके नशा देता भाषण क्या नहीं जानता नशा नाश का कारण॥ मान प्रतिष्ठा या चाहे हो शोहरत है निर्भर सब धन दौलत पर, मान प्रतिष्ठा चाहे हो शोहरत है निर्भर सब धन दौलत पर, बनकर ब्रहमचारी सामने इस जग के निगाहें रखता हर औरत पर॥ हर प्राणी ईश्वर की रचना फिर... »

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