Sher-o-Shayari

इश्क-ए-खुदाई – 2

इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है जग की बेजड़–सोचें इसने छोडा़ई हैं »

इश्क-ए-खुदाई – 1

इश्क–ए–खुदाई भी कैसा सौदाई है मन  डोर झूम के यूँ तुझमें बंधायी है »

है इरादा गर अटल

माना के यह राह् है कुछ जटिल समाने का मुझमें है इरादा गर अटल तो मुश्क़िल हर पार तूँ कर जाएगा काँटों पे चल समा मुझमें जाएगा »

सकून

दहक रही है जो आग तुझमें मिलेगा सकून उसे मिल मुझमें सिमटने की मुझमें तेरी बेकरारी है मुझे अपनी ख़ुदाई से भी प्यारी »

मैं – तूँ

हूँ मैं जो रौशनी है तूँ भी वही रौशनी हूँ तूँ जो रौशनी है मैं भी वही रौशनी »

ज़िन्दगी ना थी – 11

ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी इस ज़िन्दगी के बाद भी यूई के बुलंद हौंसलों पे दुश्मन भी इतराते हैं  »

ज़िन्दगी ना थी – 10

ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी इस ज़िन्दगी के बाद भी सामने मेरे आने से अब तूफान भी घभराते हैं »

ज़िन्दगी ना थी – 9

ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी इस ज़िन्दगी के बाद भी लिया है सीख रुख पलट बाधाओं के हर हाल में जीना हमने »

ज़िन्दगी ना थी – 8

ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी इस ज़िन्दगी के बाद भी लिया है सीख अवरोधों को सर करना हमनें  »

ज़िन्दगी ना थी – 7

ज़िन्दगी ना  थी कुछ हमारी, जैसी तुम्हारी आस्मानी अरमानो के ना थे पंख हमारे, जैसे तुम्हारे »

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