Hindi-Urdu Poetry

मेरी खिड़की से

मेरी खिड़की से कोई ख्वाब निकल फिर खो गया इन हवाओं में अब मैं खिड़की बंद रखने लगा अब ख्वाब आते है भागते भी नहीं बस इक घुटन सी फैलती है उनके साथ रहने से हवा सी चीज़ है ये ख़्वाब भी बस महसूस होते है इन्हे मुठी में जकड नहीं सकते ख्वाब हवाओं में ही रहने को बने है अब फिर मैंने खिड़की खोल दी है राजेश’अरमान’ »

आए न रास किश्तों के क़त्ल

आए न रास किश्तों के क़त्ल ,क़त्ल हो तो एक बार हो मेरे क़ातिल दुआ मेरी ,तेरे खंजर की न खत्म कभी धार हो देते है खुद को धोखा ,औरो के फरेब से क्या बच पाएंगे वो अपने गिरेबां में झाकने से जो गुरेज करें,वो खुद से क्या शर्मशार हो चल के बैठे फिर उस महफ़िल पे क्यों गैरत के खिलाफ उस महफ़िल कभी न जाना जहाँ तेरे वज़ूद की मजार हो तिनके तिनके से बिखर जाते है न जाने क्यों ये नशेमन किसी नशेमन का इन आंधिओं से इस कदर न प्... »

अनंत की खोज

अनंत की खोज व्याकुल सा कण कण मन चंचल अपार चिंतन जिजीविषा मृतप्राय अपने होने का अभिप्राय एक खोज अनंत की निष्कर्ष मरीचिका एक खोज मोक्ष की निष्कर्ष अज्ञात एक खोज सृष्टि की निष्कर्ष मौन मोक्ष किसका निष्कर्ष शून्यता का राजेश’अरमान’ »

वो इतना ही कह सका

वो इतना ही कह सका था तुझसे रुखसत पे जान हाज़िर है तेरे वास्ते तेरी निस्बत पे बाग़ की रौनके पूछिए उस बागबाँ से जिसने खिलाये है फूल तेरी चाहत पे कौन समझा है इन हवाओं के रुख को यहाँ इख्तियार नहीं है इन हवाओं के आक़िबत पे हर्फ़ निकले लबों से ,ज्यों जां निकलती है जब तेरी बेरुखी को सजाया था अपनी आदत पे लो फिर छेड़ दी दास्ताने-हिज़्र तुमने ‘अरमान’ क्या हो जाता है हासिल तुझे खुद की उक़ूबत पे वो इतन... »

दर्द के चरागों को बुझने का

दर्द के चरागों को बुझने का

दर्द के चरागों को बुझने का कोई बसेरा दे दो ग़ुम हुए लोगों को कोई इक नया चेहरा दे दो इन सुर्ख आँखों का कसूर तुम्हारा हिस्सा है इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पहरा दे दो चीखें सुनकर भ... »

दर्द के चरागों को

दर्द के चरागों को बुझने की कोई हवा दे दो ग़ुम हुए लोगों को लौटने का कोई पता दे दो इन सुर्ख आँखों का कसूर इतना तुम्हारा हिस्सा है इन आँखों को तुम कोई ख्वाब सुनहरा दे दो न शजर, न कोई शाख, न पत्तों का कसूर अपने बाग़ों को बस थोड़ा सा चेहरा दे दो छोटी छोटी बातों से क्यों जख्म रोज़ देते हो एक बार ही कोई ज़ख्म मुझे गहरा दे दो निस्बत कुछ ज़माने से यूँ निभाए न कोई हर रिवाज़ों पे ज़माने का कोई पर्दा दे दो हर तरफ बद... »

है तो इंसा ही हम

है तो इंसा ही हम कोई खुदा नहीं है, गुस्ताखिओं की और कोई वज़ह नहीं है गिरते झरने से, अच्छे लगते है उड़ते परिंदे पर मेरा अक्स ये जमीं है कोई आस्मां नहीं है यूँ तो रखते है हम भी बेइंतेहा पाक नज़र पर वज़ूद खाक है ,किसी मस्जिद की चौखट नहीं है सरफ़रोश हो भी जाते गर गमजदा न होते पर तुझ पे मिटना भी सरफ़रोशी से कम नहीं है गर्दिश-ऐ -मुदाम से हम हो गए इतने आज़र्दाह आब-ए-आईना हूँ ,पर अपनी ही सूरत नहीं है हमने ढोये ... »

मेरे अस्तित्व

मेरे अस्तित्व के इर्दगिर्द बैठे है कई जाल मकड़ी के भेदना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे सत्य के इर्दगिर्द बैठे है असत्य के पंछी उड़ाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे मन के इर्दगिर्द बैठे है अहंकार के पशु भगाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे कामना के इर्दगिर्द बैठे है भाग्य के दानव हटाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरी आत्मा के इर्दगिर्द बैठा हूँ मैं स्वयं निहारना संभव पर प्रयास अतृप्त राजेश’अरमान’ »

अनुभूति से ओतप्रोत

अनुभूति से ओतप्रोत जीवन चलता है जैसे कोई लहर जैसे कोई झोँका जैसे कोई मौसम बस अनुभूति ही तो है अनुभूति से परे अपने भीतर का अपने मन का अपने अंतर्द्वंद का कोई नाता होता है किन्तु बिखरा बिखरा किन्तु टूटा टूटा इस टूटे टूटे को जोड़ना जोड़ना होगा पंछी को खुले आकाश पे उड़ने के लिए छोड़ना होगा कहीं पिंजरे में रहकर कोई पंछी आकाश को नाप सकता है नापना आकाश का उतना अनिवार्य नहीं जितना अपने को नापना लहर का अपना स्व... »

तुम एक परिणाम हो

तुम एक परिणाम हो तुम क्रिया नहीं हो सृष्टि एक क्रिया है जो रची गयी है रचने की क्रिया एक अलोकिक सत्य है प्रकृति ,पानी .वायु ,अग्नि सब परिणाम है बस तुम्हारी तरह तुम भयभीत क्यों हो ? परिणाम के पश्चात कुछ नहीं होता न भय ,न प्रश्न सृष्टि जब -जब रची जाएगी तब-तब तुम उसके परिणाम होगे क्योकि? तुम एक परिणाम हो राजेश’अरमान’ »

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