Hindi-Urdu Poetry

है तो इंसा ही हम

है तो इंसा ही हम कोई खुदा नहीं है, गुस्ताखिओं की और कोई वज़ह नहीं है गिरते झरने से, अच्छे लगते है उड़ते परिंदे पर मेरा अक्स ये जमीं है कोई आस्मां नहीं है यूँ तो रखते है हम भी बेइंतेहा पाक नज़र पर वज़ूद खाक है ,किसी मस्जिद की चौखट नहीं है सरफ़रोश हो भी जाते गर गमजदा न होते पर तुझ पे मिटना भी सरफ़रोशी से कम नहीं है गर्दिश-ऐ -मुदाम से हम हो गए इतने आज़र्दाह आब-ए-आईना हूँ ,पर अपनी ही सूरत नहीं है हमने ढोये ... »

मेरे अस्तित्व

मेरे अस्तित्व के इर्दगिर्द बैठे है कई जाल मकड़ी के भेदना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे सत्य के इर्दगिर्द बैठे है असत्य के पंछी उड़ाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे मन के इर्दगिर्द बैठे है अहंकार के पशु भगाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरे कामना के इर्दगिर्द बैठे है भाग्य के दानव हटाना असंभव मगर प्रयास अनवरत मेरी आत्मा के इर्दगिर्द बैठा हूँ मैं स्वयं निहारना संभव पर प्रयास अतृप्त राजेश’अरमान’ »

अनुभूति से ओतप्रोत

अनुभूति से ओतप्रोत जीवन चलता है जैसे कोई लहर जैसे कोई झोँका जैसे कोई मौसम बस अनुभूति ही तो है अनुभूति से परे अपने भीतर का अपने मन का अपने अंतर्द्वंद का कोई नाता होता है किन्तु बिखरा बिखरा किन्तु टूटा टूटा इस टूटे टूटे को जोड़ना जोड़ना होगा पंछी को खुले आकाश पे उड़ने के लिए छोड़ना होगा कहीं पिंजरे में रहकर कोई पंछी आकाश को नाप सकता है नापना आकाश का उतना अनिवार्य नहीं जितना अपने को नापना लहर का अपना स्व... »

तुम एक परिणाम हो

तुम एक परिणाम हो तुम क्रिया नहीं हो सृष्टि एक क्रिया है जो रची गयी है रचने की क्रिया एक अलोकिक सत्य है प्रकृति ,पानी .वायु ,अग्नि सब परिणाम है बस तुम्हारी तरह तुम भयभीत क्यों हो ? परिणाम के पश्चात कुछ नहीं होता न भय ,न प्रश्न सृष्टि जब -जब रची जाएगी तब-तब तुम उसके परिणाम होगे क्योकि? तुम एक परिणाम हो राजेश’अरमान’ »

गैरों से क्या करें

गैरों से क्या करें शिकायत अपनों से ही मिली तिज़ारत रूसवाइयां तेरी साथ लेकर कर लेंगे इस जहाँ से रुखसत राजेश ‘अरमान’… »

सहारे बदल गए

हम भी है तुम भी हो ,पर ये सहारे बदल गए लहरें तो वही है मगर ये किनारे बदल गए लोग पत्थर के बन गए है , ,दिल हमारे है आईने हम तो अब भी वही मगर ये हमारे बदल गए कल तक महका करती थी बगियाँ ये फूलों से , माली तो वहीँ मगर चमन के नज़ारे बदल गए इस ईमारत की बुनियाद तो अब भी है बुलंद बस रहने वालों के हाथों के इशारे बदल गए यादों के दिए आखिर कब तक जलाये ‘अरमान’ अफ़सोस तेरे बदलने का यूँ तो सारे बदल गए रा... »

गर निकल पड़े जो सफर को

गर निकल पड़े जो सफर को देख मुड़ के न फिर डगर को आएँगे यूँ तो कई विघ्न पड़ेंगे देखने कई दुर्दिन हौसला हो साथ अगर हो जायेंगे ये छिन-भिन्न तट से जो भटक गई हो, तो दो मोड़ उस लहर को गर निकल पड़े ——— गर काली रात हो सामने बढ़ाओ हाथ अंधेरों को धामने देंगे फिर घुटने टेक दो पल के ये है पाहुने गर डस ले सर्प कालरूपी उगल डालो उस जहर को गर निकल पड़े ——– गर फस जाएँ तूफा में कस्ती लगन... »

निकला ढूंढने

निकला ढूंढने अपने दुश्मन को कोई मिला नहीं टटोला जो अपने मन को पहचान गया अपने दुश्मन को राजेश ‘अरमान’ »

तुम महज एक तस्वीर हो

तुम महज एक तस्वीर हो मैं जानता हूँ कि, तुम महज इक तस्वीर हो ओर उससे आगे कुछ भी नहीं मगर दिल ये कहता है तुम महज इक तस्वीर नहीं हो सुना था तस्वीरें बोला नहीं करती पर तुम क्यों बोलती हो क्यों मेरे निहारने से तुम्हारी तस्वीर का रंग सूर्ख हो जाता है क्यों कन्खिओं से देखते तस्वीर का रुख बदल जाता है तुम महज इक तस्वीर नहीं हो क्यों मेरा आँगन भरा रहता है फूलों से जो तेरे हसने से झरते है जबकि मैं जानता हूँ ... »

मेरे ज़ख्मों का खाता

मेरे ज़ख्मों का खाता इक दिन नीलाम हो गया दुश्मनों को मिला न हिसाब और इन्तेक़ाम हो गया वाबस्ता थे जिन चेहरों से ,जो थे मेरे रात दिन उनके चेहरों का रंग सारे शहर में सरे-आम हो गया कब तलक छुपती है किसी चेहरे पे पड़ी नक़ाब मेरे क़ातिल का खुद-ब-खुद क़त्ल -ऐ -आम हो गया उसकी गैरत से कब भला मेरा वास्ता न था , उसकी निगाहों में मेरा और कोई इंतज़ाम हो गया सुर्खिआं अखबार की बन जाओगे क़त्ल कर भी ‘अरमान’ तिर... »

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