Hindi-Urdu Poetry

मुझे बारिश में भीगना पसंद था

मुझे बारिश में भीगना पसंद था, तम्हें बारिश से बचना… तुम चुप्पे थे, चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाने वाले। मैं बक-बक करती रहती। बस! वही नहीं कह पाती जो कहना होता। तुम्हें चाँद पसंद था, मुझे उगता सूरज। पर दोनों एक-दूजे की आँखों में कई शामें पार कर लेते। मुझे हमेशा से पसंद थीं बेतरतीब बातें और तुम्हें करीने से रखे हर्फ़। सच! कितने अलग थे हम.. फ़िर भी कितने एक-से। »

धूल मेँ लिपटा माज़ी

जब चलते-चलते थक जाओ तो कुछ देर ही सही थाम लेना पैरोँ के पहिए.. बहाने से उतर जाना पल दो पल ज़िन्दगी की साइकल से.. देखना ग़ौर से मुड़कर कहीँ बहुत पीछे तो नहीँ छूट गया ना.. धूल मेँ लिपटा माज़ी…. »

प्रेम कविता

प्रेम कवितासबने प्रेम पर जाने क्या-क्या लिखा फ़िर भी अधूरी ही रही हर प्रेम कविता »

वही पुरानी तसल्ली

सो जाते हैं जो सोचकर, उन्हे ख्वाब नहीं मिलता। जिनकी परछाइ होती है मुहब्बत, उन्हे जवाब नहीं मिलता। »

अधूरी सी कविता

तेरे जाने पे खुद को समेट लिया था सोचा था ज़िन्दगी खत्म है ना नींद थी ना चैन था इश्क़ इबादत थी कभी ना रैन था बात दिल की लफ़्ज़ों में थी पर लब पे खामोशी सी थी सच कह रहा तेरी कसम आज भी सपनों मैं तेरी राह तकता हूँ ज़िन्दगी के और कुछ पल खुदा ज़रूर लिखता तोह उसका क्या बिगड़ता मन के किसी कोने में आज भी मुलाकात की उम्मीद रखता हूँ »

वही पुरानी तसल्ली

हुई थी खता हमसे, हमारा ही वो नजर था रखा था कदम जिस गली मे, वो गली ही उनका शहर था। By Rajjneesh »

वही पुरानी तसल्ली

देखते हो उस शख्स को तुम, By जिसे तुम शाद करते हो। नाम मुहब्बत रहता है बस , Rajjneesh बाकी तुम बर्बाद करते हो। »

वही पुरानी तसल्ली

बहती है हवा रातों को, तो कभी चमकता सितारा होता है। होती है मोहब्बत जिसे बार बार, उसे बेवफ़ाई का सहारा होता है। By Rajjneesh »

तकनीकी की लय

तकनीकी की लय में रिश्ते अब ढल रहें हैं , पीर की नीर हो अधीर जल धारा बन बह रही है, मन्तव्य क्या, गन्तव्य क्या, भावनाओ की तरंगे सागर की लहरो सी, विक्षिप्त क्रंदन कर रही हैं। तकनीकी की प्रवाह में संवेदनाएं ढल रहीं है, मौन प्रकृति के मन को जो टटोल सकें वो मानस कहाँ बन रहें हैं, आधुनिकता की होड़ में नव कल से मानव ढल रहे हैं, शुष्क मन संवेदनहीन जन कल से यूँँ हीं चल रहें हैं, तकनीकी के लय में कल से जीवन ढ... »

तकनीकी की लय

तकनीकी की लय में रिश्ते अब ढल रहें हैं , पीर की नीर हो अधीर जल धारा बन बह रही है, मन्तव्य क्या, गन्तव्य क्या, भावनाओ की तरंगे सागर की लहरो सी, विक्षिप्त क्रंदन कर रही हैं। तकनीकी की प्रवाह में संवेदनाएं ढल रहीं है, मौन प्रकृति के मन को जो टटोल सकें वो मानस कहाँ बन रहें हैं, आधुनिकता की होड़ में नव कल से मानव ढल रहे हैं, शुष्क मन संवेदनहीन जन कल से यूँँ हीं चल रहें हैं, तकनीकी के लय में कल से जीवन ढ... »

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