Hindi-Urdu Poetry

ऐसा वक्त कहाँ से लाऊँ

ऐसा वक्त कहाँ से लाऊँ

कविता – ऐसा वक्त कहाँ से लाऊं वेफिकरी की अलसाई सी उजली सुबहें काली रातें हकलाने की तुतलाई सी आधी और अधूरी बातें आंगन में फिर लेट रात को चमकीले से तारे गिनना सुबह हुए फिर सबसे पहले पिचगोटी का कंकड़ चुनना मन करता है फिर से मैं एक छोटा बच्चा बन जाऊं जो मुझको बचपन लौटाए ऐसा वक्त कहाँ से लाऊं. बारिश के बहते पानी में छोटी कागज नाव चलाना आंगन में बिखरे दानों को चुंगती चिड़िया खूब उड़ाना बाबा के कंधों ... »

नवसंवत्सर को नज़राना

फाल्गुन की ब्यार में, कोयल की थी कूक गिरते हुए पत्तों की सरसराहट उर में उठाती थी हूक॥ जीवंत हो उठी झंझाएँ मानो कुछ कहती थीं रह-रहकर आती चिड़ियों की चहचहाहट निज क्रंदन का राग सुनाती थीं। बलखाती-लहराती वृक्षों की डाली, मानो मुझे बुलाती थीं। सन्नाटे उस उजली धूप के, स्पष्ट सुनाई देते थे झिलमिलाती किरणें आ पत्तों के बीच से, प्रकाशमय वर्णों को कर जाती थीं, त्वरित-घटित निज गाथाओं याद मुझे दिलाती थीं मानव-... »

नवसंवत्सर को नज़राना

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Meri Manzil

Meri Manzil

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यादें

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खुदा मेरा भी अपना होता

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खुदा मेरा भी अपना होता

खुदा मेरा भी अपना होता

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कच्ची पेंसिल

कच्ची पेंसिल

आज कल के महंगे बॉलपेन से , मेरी कच्ची पेंसिल अच्छी थी || बॉलपेन की रफ़्तार से , मेरी पेंसिल की धीमी लिखावट अच्छी थी || गलती पर रब्बर पेंसिल का साथ , होता गुरु शिष्ये का आभास || गुरु की डाट पर वो रब्बर से मिटाना , लिखे पर फिर से पेंसिल घुमाना , सिखने तक ये सब दोहराना , वो बचपन की सीख सच्ची थी || बॉलपेन के स्थाईत्व से , मेरे बचपन की हर गलती अच्छी थी || आज कल के महंगे बॉलपेन से , मेरी कच्ची पेंसिल अच्... »

तेरे न होने का वज़ूद

एक तू ही है जो नहीं है बाकि तो सब हैं लेकिन… तेरे न होने का वज़ूद भी सबके होने पे भारी है मुझे भी जैसे तुझे सोचते रहने की एक अज़ीब बीमारी है। नहीं कर सकता आंखे बंद क्योंकि तेरा ही अक्ष नज़र आना है उसके बाद तब तक जब तक मैं बेखबर न हो जाऊ खुद के होने की खबर से और अगर आंखे खुली रखूँ तो दुनिया की फ्रेम में एक बहुत गहरी कमी मुझे साफ नज़र आती है जो बहुत ही ज्यादा चुभती चली जाती है क्योंकि उस फ्रेम में... »

SHAYARI

उसके चुप रहने का अंदाज़ बहुत कुछ कहता है इशारो की बातें हैं कोई लफ्ज़ भी इतने सलीखे से नहीं कहता है। »

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