Hindi-Urdu Poetry

समझ

किसी सांचे में भी ढल नहीं पाया हूँ मैं, शायद ठीक से ही बन नहीं पाया हूँ मैं, वक्त बेशक ही लगा है मुझको बनाने में, पर सच है खुद को बदल नहीं पाया हूँ मैं, तोड़ा-जोड़ा भी गया हूँ कई बार ऊपर से, कभी भीतर से मगर संभल नहीं पाया हूँ मैं, मैं रिश्तों से हूँ या रिश्ते मुझसे हैं कायम, उलझन ये है के कुछ समझ नहीं पाया हूँ मैं॥ राही (अंजाना) »

माँ

माँ

देखा किसी ने नहीं है मगर बहुत बड़ा बताते हैं लोग, कुछ लोग उसे ईश्वर तो कुछ उसे खुदा बताते हैं लोग, पता किसी के पास नहीं है मगर रस्ता सभी बताते हैं लोग, कुछ लोग उसे मन्दिर तो कुछ उसे मस्ज़िद बताते हैं लोग, ढूढ़ते फिरते हैं जिसे हम यहां वहां भटकते दर बदर, तो कुछ ऐसे भी हैं जो उसे तेरी मेरी माँ बताते हैं लोग।। राही (अंजाना) (Winner of ‘Poetry on Picture’ contest) »

पहला प्यार

पहला प्यार जाम की तरह होती हैं जब भरी हो तोह उसका अहसास नहीं होता जब खाली हो तोह उसकी लत छूटती नहीं »

ऊँगली

अब एन्टिना कोई घुमाता नहीं, छत पर यूँहीं कोई जाता नहीं, बैठे रहता हर एक यहां फैल कर, अब रिमोट से ऊँगली हटाता नहीं।। राही (अंजाना) »

कैसे बयां करें अपनी दास्ता

कोई लफ़्जों में कैसे बयां करें अपनी दास्ता दर्द हर लफ़्ज के साथ गहराता जाता है »

हौसलों की उड़ान

सुरज की स्वर्णिम किरणें जब पड़ती धरा पर, चहचहाते पक्षी मचाते कलरव, हौसलों की भरते वो उड़ान है, देखो जज़्बा उन पंछियों का, छू लेते वो आसमान है। देखकर पंछियों को लगता मेरे मन को, काश कि मै भी उड़ सकता, पंख फैलाकर नील गगन को मै भी छू सकता। बस सोच ही रहा था बैठे-बैठे, कि मेरे मन में ये ख्याल आया.. है पंछियों के जैसे मेरे पंख नहीं तो क्या, है बुलंद इरादा मेरे भीतर जो छिपा बैठा, है मुझमे हिम्मत, है हौसल... »

ख़रीददार

किसी कीं ख़ातिर दिल में मोहब्बत लेकर भटक रहे हैं सब ख़रीददार मिलते हैं, बिकनेवाले नहीं मिलते | »

इज्जत

बहुत कुछ कहते कहते रुक जाया करते हैं, बात ये है के हम इज्जत कर जाया करते हैं, रखते हैं अल्फ़ाज़ों का समन्दर अंदर अपने, और ख़ामोशी से दिल में उतर जाया करते हैं, प्रश्न ये बिल्कुल नहीं के उत्तर मिलता नहीं हमें, जंग ये है के हम जवाबों में उलझ जाया करते हैं, हाथों की लकीरों पर “राही” हम चला नहीं करते, तो क्या हुआ मन्ज़िल के मुहाने पर तो जाया करते हैं।। राही (अंजाना) »

गुंजाईश

मेरी आँखों में ही खुद को निहारा करता है, हर रोज़ ही वो चेहरा अपना संवारा करता है, आईने के सही मायने उसे समझ ही नहीं आते, कहता कुछ नहीं बस ज़हन में उतारा करता है, गुंजाइय दूर तलक कहीं सच है नज़र नहीं आती, के वो किसी और के भी मुख को निखारा करता है।। राही (अंजाना) »

मुक्तक

मैं तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ? मैं तड़पाती यादों की जागीरों का क्या करूँ? मैं अश्कों को पलकों में रोक सकता हूँ लेकिन- मैं दर्द की लिपटी हुई जंजीरों का क्या करूँ? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

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