Hindi-Urdu Poetry

जिसकों कहतें थे हम हमसफ़र अपना।

जिसकों कहतें थे हम हमसफ़र अपना। वो तो था ही नही कभी रहगुज़र अपना।। , तुमको मुबारक हो भीड़ इस दुनिया की। हम काट लेंगे तन्हा ही ये सफर अपना।। , भूल गए हो यक़ीनन तुम अपने वादे सारे। पर उदास रहता है वो गवाह शज़र अपना।। , न कोई मुन्तज़िर है न है कोई आहट तेरी। फिर भी सजाता है कोई क्यू घर अपना।। , ऐ बादल बरसों ऐसे भीगों डालो सबकुछ। की साहिल जलता बहुत है ये शहर अपना। @@@@RK@@@@ »

ऐसा क्यों है

ऐसा क्यों है

चारो दिशाओं में छाया इतना कुहा सा क्यों है यहाँ जर्रे जर्रे में बिखरा इतना धुआँ सा क्यों है शहर के चप्पे चप्पे पर तैनात है पुलिसिया फिर भी मचा इतना कोहराम सा क्यों है. मिलती है हरएक को छप्पर फाड़कर दौलत फिर भी यहाँ मरता भूख से इंसान सा क्यों है चारो तरफ बिखरी हैं जलसों की रंगीनियाँ फिर भी लोगों में इतना अवसाद सा क्यों है. हर कोई मन्दिर मस्जिद में जा पुण्य कमाता फिर भी बढ़ता यहाँ इतना पाप सा क्यों है... »

राघवेन्द्र त्रिपाठी

राघवेन्द्र त्रिपाठी

हर रास्ता हमसे तंग हुआ, हम फिर रास्ते की तलाश मे निकले , शजरो शजर की चाहत मे रास्ते महज इत्तेफाक निकले । ठहरे जहाँ पल भर को ब आजादी ब आबोताब , हमारी आबादी का जनाजा लेकर लोग सब बर्बाद निकले । वो इन्तजार मे था के धुन्ध छटे कोई अपना दिखे , रोशनी हुई तो चेहरे महफूज नकाब निकले । वो अपने ईमान पे अकड़ता रहा ताउम्र, कत्ले जमीर करके लोग सर उठा बेबाक निकले । मुद्दत गुजरी इक हमराह की चाहत मे , वीराने सब अस्बा... »

Dilo jajbaat per nazar rakhiye

दिलो ज्जबात पर नजर रखिये गुमशुदा कुछ ना हो ये खबर रखिये दिल ना टूटे ज्जबात भी नहीं चटके दिल की दहलीज पर यूँ नजर रखिये “ »

…………..एक जिंदगी ऐसी भी है ……….

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ग़ज़ल-ये तुम क्यों भूल गए

ग़ज़ल-ये तुम क्यों भूल गए मैंने तुम से प्यार किया था…..ये तुम क्यों भूल गए तुमको सब कुछ मान लिया था ये तुम क्यों भूल गए सुबह थी तुम शाम थी तुम मेरे दिल की जान थी तुम सब कुछ तुझपर वार दिया था ये तुम क्यों भूल गए हर जन्म साथ निभाने का एक-दूसरे को अपनाने का साथ मिलकर कसम लिया था ये तुम क्यों भूल गए हर पल तेरा साथ दिया तेरे हर सुख-दुख के लमहों में तेरे हर एक जख्मो को सिया था ये तुम क्यों भूल गए एक... »

muktak

चलो मिलकर प्रेम के कुछ रंग- ो-रस चख लो हर धर्म की परिभाषा का ये नाम रख लो गर चाहते हो हिंदुस्तान को खुशहाल देखना तो, तुम्हारे अल्लाह मुझको दे दो , तुम मेरे राम रख लो कवी नवीन गौड़ पेटलावद कानाफूसी क्रमांक 9921803580 »

मुक्तक

यूँ ही रोशनी नही होती, मोम को जलना पड़ता है यूँ ही चाहत नही मिलती इश्क़ की हद से गुज़रना पड़ता है “विपुल कुमार मिश्र”   »

वजूद

आंखों की यह पलकें झपका के तो दिखा सच बताऊ यह भी ना कर पाएगा। उस परमात्मा के कारण ही तेरा वजूद है उसके बिना, मिट्टी में मिल जाएगा। यह पैसा, यह शरीर सब नाशवान हैं कुछ भी साथ ना जाएगा। मरने के बाद भी, कुछ लोगो की जरूरत होगी नहीं तो “सुखबीर” शमशान कैसे जाएगा।   »

उम्र की पतंगें !

कविता   उम्र की पतंगें : अनुपम त्रिपाठी   वे, बच्चे ! बड़े उल्हास से चहकते—मचलते; पतंग उड़ाते …………. अचानक थम गए !!   उदास मन लिए लौट चले घर को ———— पतंग छूट जाने से ———— डोर टू…ट जाने से   क्या, वे जान सकेंगे ? कभी कि; ———— हम भी बिखेरा करते थे, मुसकानें यूं ही : चढ़ती उम्र के; बे—पनाह जोश में .   मग... »

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