Ghazal

वक्त का वक्त क्या है पता कीजिए

गजल वक्त का वक्त क्या है पता कीजिए | बाखुदा हूं ‘ खुदा बाखुदा कीजिए | दर्दे – दिल आज मेरे मुखालिब रहे | सुखनवर से उन्हें ‘ आशना कीजिए | चांद तक की अदा कुछ सँवर जायेगी | अश्क आंखों से गर आबशा कीजिए | कल्बे – रहबर इनायत बनी गर रहे | चंद – लम्हों में फिर राब्ता कीजिए | मशवरा ये हुकूमत तुम्हीं से लेगी | नौजवानों खड़ा ‘ काफिला कीजिए | जब वरक लफ्ज तेरे आगोश मे हैं | दर... »

ग़मगीन लम्हों का मुस्कुराना हुआ है

ग़मगीन लम्हों का मुस्कुराना हुआ है —————————————- कोई एहसास दिल को छुआ है मुमकिन है,आपका आना हुआ है ख़्वाबों की धुन्ध छँटने लगी इक फ़साने का, हक़ीक़त होना हुआ है सिसक रही तन्हाई भी हँस पड़ी नज़र को नज़र का नज़राना हुआ है तसल्ली ने दिया-दिल को यकीं- इंतज़ार में पलों का सताना हुआ है इज़हार को मचलने लगी क़शिश सूना जीवन सुहाना हुआ है ले... »

बिछडा जो फिर तुमसे

बिछड़ा जो फिर तुमसे तनहा ही रह गया, ग़म-ए-हिज़्र मे अकेले रोता ही रह गया। मुसलसल तसव्वुर में बहे आँसू भी खून के शब् में तुझे याद करता, करता ही रह गया! मैंने शाम ही से बुझा दिए हैं सब चराग, शाम से दिल जला तो जलता ही रह गया। था गांव में जब तलक प्यास ना थी मुझे शहर जो आ गया हूँ तो प्यासा ही रह गया कुछ ना रहा याद मुझे बस आका का घर रहा, मेरी आँखों में बस मंज़रे-मदीना ही रह गया सच का ये सिला हैं के फांसी मि... »

जिंदगी और मौत

सोज़िशे-दयार से निकल जाना चाहता हूँ, हयात से अदल में बदल जाना चाहता हूँ! तन्हाई ए उफ़ुक़ पे मिजगां को साथ लेके, मेहरो-माह के साथ चल जाना चाहता हूँ! आतिशे-ए-गुज़रगाह-ए-चमन से हटकर, खुनकी-ए-बहार में बदल जाना चाहता हूँ मैं हूँ खुर्शीद-ए-पीरी जवानी के सफ़र में, बहुत थक गया हूँ ढल जाना चाहता हूँ! मैं हूँ ‘तनहा’ शिकस्ता तन-ओ-जहन से, आशियाँ-ए-बाम पर टहल जाना चाहता हूँ तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’ »

मयस्सर कहाँ है।

मयस्सर कहाँ हैं सूरते-हमवार देखना, तमन्ना हैं दिल की बस एक बार देखना! किसी भी सूरत वो बख्शा ना जायेगा, गर्दन पे चलेगी हैवान के तलवार देखना! सज़ा ए मौत को जिनकी मुत्ताहिद हुए हैं हम आ जायेगी उनको बचाने सरकार देखना करो हो फ़क़त तुम गुलो की तारीफ बस, कभी तो गुलशन के भी तुम खार देखना। केमनी टी स्टाल पर यही करते है हम रोज़, चाय पीते रहना औ र तेरा इंतज़ार देखना। अपनी खुद्दारी ‘तनहा’ तू छोड़ेगा तो ... »

विष मय है आज देख परिवेश।

✍?(गीताज ) ?✍ ——-$——- ✍ विष मय है आज देख परिवेश। आक्रोश मे घुला है सुप्त आवेश।। कण कण मे गुस्सा आलम मे नव क्रोध धरती है कुम्हलाई पल बना है अबोध क्षण बना है विद्रोही खाके ठेस । आक्रोश मे घुला है सुप्त आवेश।। नजारो मे अहम बचनो मे फरेब चापलूसी मे बैठा ठाठ अकड ऐठ ऐब घृणित मंजर काढ़े बैठा है भेष । आक्रोश मे घुला है सुप्त आवेश।। मानवता है पीड़ित इंसानियत है बुझी मानव देख है वेबश ... »

Tuje Dil se bhulana chahata hu

Tuje Dil se bhulana chahata hu

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जिंदगी मे व्यवहार जिंदा रखिए

✍?(अंदाज)?✍ —–$—– ✍ जिंदगी मे व्यवहार जिंदा रखिए जिंदगी मे सुसंस्कार जिंदा रखिए रूठना मनाना क्रम है जीवन का रूठकर भी नेह धार जिंदा रखिए सच्चे प्रेम की परिभाषा यही है नेह का श्रद्धा आपार जिंदा रखिए बुराईया कटुता है मन का कचरा मंशा मे शुद्धता सार जिंदा रखिए सबको मिले संसार की हर खुशी ऐसा सात्विक विचार जिंदा रखिए खुद से मिले इंसान को प्रसन्नता धारणा ऐसी बेशुमार जिंदा रखिए ✍ श्... »

जख्म दबाकर मुश्काता हूं

जख्म दबा – कर मुश्काता हूं | चुप रहकर मैं चिल्लाता हूं | मेरी बातें खुल न जाये | बातों से ‘ मैं बहकाता हूं | घर में ‘ आग लगा मत देना | पानी पर मैं चढ़ जाता हूं | मेरी आंखें नोच न लेना | कुछ तो तुमको दिखलाता हूं | गहरी चोटें बोल रही हैं | खुद के खातिर लड़ जाता हूं | तुम सब अपना छोड़ो यारों | झूठा खुद को बतलाता हूं | सारी ख्वाहिश ‘ छोड़ न देना | अरविन्द तुम्हे समझाता हूं | ❥ कुमा... »

हुआ हूं खाक यहां रह गया

हुआ हूँ ख़ाक यहां रह गया ‘ धुआं मेरा | किसी में दम है तो रोको ये कारवां मेरा | सभी ये कहते है अक्सर ज़मीन मेरी है | कोई ये क्यों नही कहता है आसमां मेरा | बदन से रूह तलक मैं ही बस गया तुझमें | मिटायेगा तू कहाँ तक बता निशां मेरा | मेरे लबों से हँसी तू मिटा न पायेगी | ए ज़िन्दगानी ले कितना भी इम्तिहां मेरा | नहीं है खौफ कि दुश्मन जहां हुआ कैसे | कि अब जहां का खुदा खुद है मेहरबां मेरा | कई हज़ार फफो... »

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