Ghazal

छुपा है चाँद बदली में…

छुपा है चाँद बदली में ,अमावस आ गयी है क्या? नहीं देखा कभी जिसको वही शर्मा गयी है क्या? मिलन की रात में ये घुप्प अँधेरा क्यों सताता है ? वो मेरा और उसका छुप छुपाना याद आता है.. अभी तो थी फ़िज़ा महकी , क़यामत आ गयी है क्या? कभी वो थी कभी मैं था, कभी चंचल चमकती रात,  न वो कहती ,न मैं कहता मगर आँखे थी करती बात.. जिन आँखों में हया भी थी,कज़ा अब आ गयी है क्या? वो नदियों के किनारो पर जहाँ जाता था मिलने को, व... »

तेरे शहर में..

आज हम भी है मेहमान तेरे शहर में,  दिखता नहीं मकान तेरे शहर में. ग़ुम हो गयी है शाम  की मस्ती  भी अब यहाँ, ग़ुम  हो गया करार तेरे शहर में.. आते  राहों  में मिल  गया तेरा आशिक, कहने लगा  न जाओ तेरे शहर में. जब से तुमने छोड़ा है दस्त ए गुलाब को, वन हो गया वीरान ,तेरे शहर में. बन्दों का हाल ऐसा मैं कह न सकता मीर, पागल हुए जवान   तेरे शहर में. दिन भर उठी है धूल,पैरों में आ लगी, मैंने कहा  सलाम है,तेरे शहर... »

एक मुलाकात की तमन्ना मे

आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे आप हमारी हकीकत तो बन न सके ख्वाबों में ही सही हम मगर मिलते रहे आप से ही चैन ओ सुकून वाबस्ता दिल का बिन आपके जिंदगी क्या, बस जीते रहे सावन, सावन सा नहीं इस तनहाई के मौसम में हम आपको याद करते रहे और बादल बरसते रहे जब देखा पीछे मुडकर हमने आपकी आस में एक सूना रास्ता पाया, जिस पर तनहा हम चलते रहे »

तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है

तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है

तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है तुझसे एक बार मैं कह दू, तू मेरी जुस्तजु है भॅवरा बनकर भटकता रहा महोब्बत ए मधुवन में चमन में चारो तरफ फैली जो तेरी खुशबु है जल जाता है परवाना होकर पागल जानता है जिंदगी दो पल की गुफ्तगु है दर्द–ए–दिल–ए–दास्ता कैसे कहे तुझसे नहीं खबर मुझे कहां मैं और कहां तू है शायर- ए- ग़म तो मैं नहीं हूं मगर मेरे दिल से निकली हर गज़ल में बस तू है »

इस कफ़स में वो उडान, मैं कहॉ से लाऊं

इन परों में वो आसमान, मैं कहॉ से लाऊं इस कफ़स में वो उडान, मैं कहॉ से लाऊं   (कफ़स  = cage) हो गये पेड सूने इस पतझड के शागिर्द में अब इन पर नये पत्ते, मैं कहॉ से लाऊं जले हुए गांव में अब बन गये है नये घर अब इन घरों में रखने को नये लोग, मैं कहॉ से लाऊं बुझी-बुझी है जिंदगी, बुझे-बुझे से है जज्बात यहॉ इस बुझी हुई राख में चिन्गारियॉ, मैं कहॉ से लाऊं पथरा गयी है मेरे ख्यालों की दुनिया अब इस दुनिया में ... »

अब न चांदनी रही न कोई चिराग रहा

अब न चांदनी रही न कोई चिराग रहा राहों में रोशनी के लिए न कोई आफताब रहा उनकी महोब्बत के हम मकरूज़ हो गए उनका दो पल का प्यार हम पर उधार रहा वेवफाई से भरी दुनिया में हम वफा को तरस गए अब तो खुद पर भी न हमें एतबार रहा शम्मा के दर पर बसर कर दी जिंदगी सारी परवाने को शम्मा में जलने का इंतजार रहा उन्हे देख देख कभी गज़ल लिखा करते थे हम अब न वो गजल रही और न वो हॅसी गुबार रहा »

वो आये कभी पतझङ कभी सावन की तरह

वो आये कभी पतझङ कभी सावन की तरह जिंदगी हमें मिली हमेशा बस उनकी तरह फूलों के तसव्वुर में भी हुआ उनका अहसास आये वो मेरी जिंदगी में खिलती कली की तरह जब से दी जगह खुदा की उनको दिल में हमने याद करना उनको हो गया इबादत की तरह डूब गया दिल दर्द ए गम ए महोब्बत में बहा ले गयी हमें साहिल ए इश्क में लहरो की तरह हुई जब रुह रुबरु उनसे जिंदगी ए महफिल में समा गयी वो मेरी रुह में सांसो की तरह »

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