Ghazal

तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं

तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं प्यार तो दूर बहुत मैं तेरी नफरत भी नहीं क्या दबा रखा है अंदर किसी खंजर की तरह अब मरासिम न सही मगर ऐसी अदावत भी नहीं ज़ख्म गीले है अपने कहीं तो निशां रहेंगे लेकिन दिल में इक शोर है मगर ऐसी बगावत भी नहीं अपने अंदर हूँ खुद किसी अजनबी की तरह जान पहचान की मगर कोई फुर्सत भी नहीं यूँ तो मिलते है सभी अपने ही सायों की तरह हाथ तो बढ़ते है मगर ऐसी कुर्बत भी नहीं राजेश R... »

ग़ज़ल

ग़ज़ल : अनुपम त्रिपाठी इक शख्स कभी शहर से ; पहुँचा था गाँव में । अब रास्ते सब गाँव के ; जाते हैं शहर को ।। खेत–फ़सल–मौसम ; खलिहान हैं उदास । ग़मगीन चुभे पनघट ; हर सूनी नज़र को ।। कुम्हलाने लगे ” चाँद” ये; घूंघट की ओट में । पायल से पूछें चूडियाँ ; कब आयेंगे घर ” वो ” ।। बेटा निढाल हो के ; हर रोज पूंछे माँ से । क्यूं छोड़ गया बापू ? इस गाँव को– घर को ।। गाँव... »

मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से

मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से आँगन तेरी आँखों का, न हो जाये कहीं तर डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से साहिल पे कुछ भी न था तेरी याद के सिवा दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह हर लम्हाँ गुज़रता है नये इम्तिहान से ©® लोकेश नदीश »

” कोई निशानी भेज दो “

मन बहलाने को कोई निशानी भेज दो नींद नहीं आती कोई कहानी भेज दो ….. संजीदा रहूँ हमेशा तेरी यादों में  मेहरबान बन कोई मेहरबानी भेज दो…. भा गया कुछ यूँ दिल को तेरा अपनापन दीदार करने तस्वीर कोई पुरानी भेज दो .. तड़प रहा हूँ कब से मिलने को   उम्मीद तुम कोई पहचानी भेज दो … जो दिलोँ – जान से हो सिर्फ मेरी ख़ुदा ऐसी कोई दानी भेज दो.. महसूस होती हैं अक्सर दिल को तेरी सिसकिया ख़त में मेर... »

पछताओगे तुम, रुसवाईयां करोगे

पछताओगे तुम, रुसवाईयां करोगे गर छोड दिया हमने तेरी गलियों मे आना कभी   तुझसे मुश्ते-मोहब्बत मांगी थी, कोई कोहिनूर नहीं बस तेरे दीदार की दरकार थी चश्मेतर को कभी   भर गये पांव आबलो से पुखरारों पर चलकर सारे घाव भर जाते ग़र मलहम लगा देते कभी   यूं इकरार ए इश्क मे तू ताखीर न कर चले गये जो इकबार, फिर ना आयेंगे कभी   घुल जाये तेरी रोशनी में रंगे-रूह मेरी ग़र जल जाये मेरी महफिल में शम्मा... »

इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ

इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ

इक नज़्म है जिसे हरपल गुनगुनाता हूँ कोरे कागज पै स्याही सा बिखर जाता हूँ हर्फ़ हालातों में ढलकत कुछ कह देते है कोई सुनता है तो मैं संवर जाता हूँ कोई साखी है तेरे मैखाने में जो पिलाती है तो बहक जाता हूँ मकरूज है जिंदगी तेरी मोहब्बत की चंद सिक्कों में ही मैं लुट जाता हूँ छिड़ी है जंग जज्बातों में आंखो से निकलने को बनकर अक्स रूखसारों पै जम जाता हूँ रंग ओ रोशनी की चाहत है किसको अंधेरों में आहिस्ते अक्सर ... »

” बड़ी फ़ुरसत में मिला मुझ से ख़ुदा है…”

    मेरी सांसो में तू महकता हैँ क़ायनात – ए – ग़ैरों में तू ही अपना लगता हैँ 1 . होंठों की ख़ामोशी समझा ना सके नैनों में इश्क़ मेरा झलकता हैँ ( 2 ) भर चुकी हैं सुराही – ए – मोहब्त इश्क़ मेरा अब बूंद – बूंद कर रिसता हैं…. ( 3 ) जितना जाना चाहूँ तुम से दूर कारवाँ यादों का उतना ही तेरी और सरकता है…( 4 ) नैनों से दूर हो तो क्या हुआ ये सुख़नवर तेरा हा... »

चाहे कितनी नफ़रत कर लो हमसे

चाहे कितनी नफ़रत कर लो हमसे तेरे दिल को अपना बनाकर रहेगें बहुत रो चुकी है आंखे हमारी तेरी आंखों से आंसू हम गिराकर रहेंगे चाहे कितनी भी अंधेरी हो जिंदगी की रातें शम्मां महोब्बत की हम जला कर रहेगें फासले बना लो चाहे कितना भी हमसे ये फ़ासले, हम मिटा कर रहेगें »

” मौत करती है रोज़ “

मौत करती है नए रोज़ बहाने कितने ए – अप्सरा ये देख यहाँ तेरे दीवाने कितने   मुलाक़ात का इक भी पल नसीब ना हुआ कोई मुझ से पूछे बदले आशियाने कितने   तेरे इंतजार में हुई सुबह से शाम ये देख बदले ज़माने कितने   उन्हें भूख थी मुझ से और उल्फ़त पाने की लेकिन दिल में मेरे चाहत के दाने कितने   नशीली उन निग़ाहों को देख नशा परोसना भूल गए मयख़ाने कितने   रंग जमा देती है मेरी सुखनवर... »

वो याद आये..

कुछ अश्कों की महफिल जमी और वो याद आये रुखसार कुछ नम से हुए और वो याद आये एक जमाने की मोहब्बत वो चंद लम्हो में भुला बैठे हम भूलकर भी उन्हे भूला ना पाये और वो याद आये चांद और उनका क्या रिश्ता है, हमें नहीं मालूम फ़लक पे चांद उतरा और वो याद आये तरन्नुम ए इश्क गाते रहे तमाम उम्र हम कोई नगमा कहीं गुंजा और वो याद आये »

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