Ghazal

सोचा नहीं था

चले जाओगे तुम ये सोच नहीं था हो जाएगें तनहा हम ये सोचा नहीं था हंसते हंसते बितायी थी जिंदगी हमने गम में ढ़ल जाएगी जिंदगी ये सोचा नहीं था तेरी आंखो के नशे मे डूबे रहे हम जिंदगी भर मय बन जाएगा मुकद्दर ये सोचा नहीं था जिंदगी क्या थी हमारी बस तुम्हारा अहसास था अहसास भी साथ न रहेगा ये सोचा नहीं था दिल ए आईने में उतार ली थी तस्वीर तुम्हारी वो आईना टूट जाएगा ये सोचा नहीं था हर शाम साथ साथ हुई थी बसर हमारी... »

गजल

2122 1212 22 कुछ दिनों से खफा-खफा सा है । चाँद मेरा छुपा-छुपा सा है ।।   कुछ तो जिन्दा है जिस्म के अंदर ; और कुछ तो जुदा-जुदा सा है ।   जब से’ उतरा हूँ’ होश की तह में  ; होश तब से हवा-हवा सा है ।   सादगी से बदल गयी रंगत  ; ये असर भी नया-नया सा है ।   उसकी’ सांसों ने’ छू लिया था कल ; जिस्म से रूह तक छुआ सा है ।   उसने’ भी आग को हवा दी थी ; हर त... »

गायब हर मंजर मेरा

गायब हर मंजर मेरा ढूढ़े परिंदा घर मेरा जंगल में गुम फ़स्ल मेरी नदी में गुम पत्थर मेरा दुआ मेरी गुम सर सर में भंवर में गुम महवर मेरा नाफ़ में गुम सब ख्वाब मेरे रेत में गुम बिस्तर मेरा सब बेनूर क्यास मेरे गुम सार दफ़्तर मेरा कभी कभी सब कुछ गायब नाम कि गुम अक्सर मेरा मैं अपने अंदर की बहार बानी क्या बाहर मेरा »

तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे

तेरी सदा का है सदयों से इन्तेजार मुझे तेरे लहू के समंदर जरा पुकार मुझे मैं अपने घर को बुलंदी पे चढ के क्या देखूं उरूजे फन! मेरी देहलीज पर उतार मुझे उबलते देखी है सूरज से मैनें तारीकी न रास आएगी यह सुबह जरनिगार मुझे कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पॉव चूमूंगा जमान लाख करे आके संगसार मुझे वह फ़ाका मस्त हूं जिस राह से गुजरता हूं सलाम करता है आशोब रोजगार मुझे »

चाँद के शौक मे

चाँद के शौक मे तुम छत पे चले मत जाना शहर में ईद की तारीख बदल जाएगी »

गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….

गमछे रखकर के अपने कन्धों पर…. गमछे रखकर के अपने कन्धों पर बच्चे निकले हैं अपने धन्धों पर। हर जगह पैसे की खातिर है गिरें क्या तरस खाएं ऐसे अन्धों पर। सारा दिन नेतागिरी खूब करी और घर चलता रहा चन्दों पर। अपना ईमान तक उतार आये शर्म आती है ऐसे नंगों पर। जितने अच्छे थे वो बुरे निकले कैसे उंगली उठाएं गन्दों पर। जिन्दगी कटती रही, छिलती रही अपनी मजबूरियों के रन्दों पर। ……..सतीश कसेरा »

एक मुलाकात की तमन्ना मे…

एक मुलाकात की तमन्ना मे…

आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे, एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे »

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तुम्हारा अक्स

तुम्हारे अक्स से दुनिया है रोशन , सुना है चाँद की तू चांदनी है . सलीका प्रेम में अब क्या करेगा , नज़र को अब के माफ़ी मिल चुकी है . ज़रा अब दर्द से नहला दो मुझको, वफ़ा की धूल काफी चढ़ चुकी है . समंदर अब के पानी मांगता है ,  सुना है प्यास उसकी बढ़ चुकी है . कहीं पर मीर ने देखा है तुझको , चमक चेहरे के उसकी बढ़ चुकी है. …atr »

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अधूरे ख्वाब

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मेरे साकी

तुम्हारी चाह ही मंज़िल हमारी ए मेरे साकी,ज़रा अब तो पिला दे न , तमन्ना अब भी है बाक़ी.मेरे साकी तेरे आँखों की मदिरा क्या बताऊँ मैं,फ़क़त आँखों से चढ़ती है ,मगर दिल तक उतरती है ,उतरना फिर भी वाज़िब था मगर अब ये लगा है कि,उतरकर भी ये चढ़ती है , और चढ़ के फिर उतरती है .   …atr »

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